रविवार, 26 फ़रवरी 2017

बाग़ी क़व्वाल - अज़ीज़ नाज़ाँ (क़िस्त 4)


हर साल अजमेर में हुज़ूर ग़रीब नवाज़ के उर्स के मौक़े पर तमाम क़व्वाल वहाँ हाज़िरी देने जाते हैं । ऐसा माना जाता है के महफ़िले-समाअ में जिस को गाने का मौका मिल गया उस कि क़िस्मत खुल जाती है । नौशाद से अलग होने के बाद अज़ीज़ साहब काफी मायूस थे, और उसी मायूसी के आलम में वो हाज़िरी के लिए अजमेर पहुंचे । दिल में मायूसी भी थी, ग़ुस्सा भी और शिकायतें भी, और जो ग़ज़ल वो वहाँ गाने के लिए ले गए थे, उस के बोल थे,
ख़्वाजा हिन्दल्वली हो निगाह ए करम, मेरा बिगड़ा मुक़द्दर संवर जाएगा 
एक अदना भीकरी जो दहलीज़ पर आ के बैठा है उठ कर किधर जाएगा 
महफ़िले-समाअ में उन्हों ने अपना नाम दर्ज करा दिया था, लेकिन गाने वालों की फ़ेहरिस्त काफी लंबी थी । सुबह के 4 बज चुके थे, और ऐसा लग रहा था के आज उन का नंबर नहीं आएगा । एक एक पल भारी था, लेकिन इंतज़ार के अलावा और कोई चारा भी नहीं था । तो इंतज़ार करते रहे, और दिल ही दिल में हुज़ूर के दरबार में फरियाद भी करते रहे कि क्या मेरा नंबर नहीं आएगा । अब ये कोई मौजिज़ा था, या करामत, या फिर उन कि क़िस्मत, उस दिन 4-5 बड़े बड़े क़व्वाल जिन का नाम उन के नाम के पहले दर्ज था, महफिल से ग़ैर हाज़िर थे । इस तरह उन का नंबर आ गया । सुबह कि अज़ान के ऐन पहले का वक़्त था । इसी वक़्त सज्जादा नशीन मज़ार पर दिया जलाते हैं । उन्हों ने मिसरा शुरू किया,
ख़्वाजा हिन्दल्वली हो निगाहे करम 
और जो आवाज़ लगाई..."या ग़रीब नवाज़" तो सारा अजमेर गूंज उठा । तक़रार शुरू हुई, 
हो निगाह-ए-करम 
करम निगाह-ए-करम 
और ये तक़रार एक घंटा चली । अजीब आलम था । अज़ीज़ साहब बेख़ुदी के आलम में गा रहे थे । उन पर रिक़्क़त तारी थी । फ़क़ीरों को वज्द आया जा रहा था । कितने ही फ़क़ीरों को महफिल से निकाल दिया गया, क्यूँ कि महफ़िल-ए-समाअ में वज्द में आने कि इजाज़त नहीं है । जिस फ़क़ीर को महफ़िल से निकाला जाता, वो जाते जाते अज़ीज़ साहब को तमांचों से नवाज़ता, कि ये उन के गाने का ही असर था जिस ने उन्हें महफ़िल से निकलवाया, लेकिन उन के लिए गिया ये तमांचे भी दुआएं बन गए थे । उन्हें होश ही न था कि क्या हुआ और क्या नहीं । इसी आलम में एक घंटा गुज़र गया, और वो मिसरे का दूसरा हिस्सा गा ही न सके । लेकिन जिस करम के वो ख़्वाहाँ थे, वो आधे मिसरे में ही हो चुका था । इसी के फ़ौरन बाद उन कि क़व्वाली "झूम बराबर झूम शराबी" मंज़र ए आम पर आई, और इस के बाद जो कुछ हुआ, वो एक इतिहास है । 
"झूम बराबर झूम" 1970 में आया था, और आते ही सुपर हिट साबित हुआ था । हर किसी की ज़ुबान पर अज़ीज़ नाज़ाँ का नाम था । अब तक उन के काफी लोगों से तअल्लुक़ात बन गए थे । जिन में हाजी मस्तान भी शामिल थे । ये 1972 की बात है, हाजी मस्तान "मेरे ग़रीब नवाज़" बना रहे थे । फ़िल्म बन चुकी थी, और उस में गुंजाइश नहीं थी, लेकिन वो अज़ीज़ साहब को इस फ़िल्म में किसी न किसी तरह शामिल करना चाहते थे । इस का हल ऊन्हों ने इस तरह निकाला कि उन्हों ने अज़ीज़ साहब कि 20 मिनट कि शो रील बनाई, जिस में झूम बराबर के अलावा उन के दूसरे हिट्स,"निगाह ए करम" और "तेरी बातें ही सुनाने आए" भी थे । जब "मेरे ग़रीब नवाज़" रिलीज़ हुई तब ये रील उस फ़िल्म के बीच में इंटरवल के बाद दिखाई जाने लगी । ये झूम बराबर का ही असर था कि ये फ़िल्म सुपर डुपर हिट साबित हुई । इस के अगले साल आई॰ एस॰ जौहर ने इस क़व्वाली को अपनी फ़िल्म "5 राइफ़ल्स" के लिए खरीद लिया । ये फ़िल्म भी इस क़व्वाली कि वजह से सुपर हिट रही । "झूम बराबर" कि कामयाबी का ये आलम था कि 1974 में बिनाका गीत माला के काउंट डाउन में ये 20 हफ्तों तक नंबर 1 पर रही । यही नहीं एयर इंडिया के म्यूज़िकल मैन्यू में इंडियन म्यूजिक सेक्शन में ये क़व्वाली भी शामिल थी । इस क़व्वाली ने उन्हें बाग़ी क़व्वाल का खिताब दिलाया था । ये उन की ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुई । वो रातों रात स्टार बन गए थे । 
पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के वो दीवानगी कि हद तक फ़ैन थे । वो उन के दोस्त भी थे और उन को इंडिया में प्रमोट करने में अज़ीज़ साहब का बहुत बड़ा हाथ रहा । फिल्मी दुनिया में कुछ लोगों से उन कि दोस्ती काफी गहरी रही । कल्याण जी भी उन में से एक थे । न सिर्फ उन्हों ने "झूम बराबर झूम" के संगीतकार के तौर पर उन का नाम दिया था, बल्कि उन के लिए उन्हों ने कई गीत भी गाए थे और साथ में देश विदेश में कई प्रोग्राम्स भी किए थे । उन के यहाँ उन का काफी आना जाना था । एक दिन कल्याण जी के घर पर उन के अलावा लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन भी मौजूद थे । बातों बातों में बात मेहदी हसन और ग़ुलाम अली कि चल निकली । लता जी मेहदी हसन कि पैरो थीं, जब कि अज़ीज़ साहब ग़ुलाम अली के फ़ेवर में डटे थे । गर्मागर्म बहस चल रही थी । उन का लता जी से इस तरह बहस करना शायद अमिताभ जी को पसंद नहीं आया । उन्हों ने बीच में दखल दे कर कहा, "लता जी कह रही हैं तो सही ही कह रही हैं, आप क्यूँ उन से बहस कर रहे हैं ।" अज़ीज़ साहब भला इतना सुनने के आदि कहाँ थे । उन्हों ने फ़ौरन जवाब दिया, "अमिताभ जी, ये मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है गाने कि बात नहीं हो रही । ये गाने बजाने कि बात है । इस में आप खामोश रहें तो बेहतर होगा ।" अमिताभ जी चुप हो गए, और लता जी इस बहस से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हों ने अपने घर पर उन का प्रोग्राम रखा । 
वो भेंड़ी बाज़ार इलाक़े कि एक चाल में रहते थे । उन का ससुराल सांताक्रूज में था । उन की बीवी ने सांताक्रूज में एक फ्लैट खरीद लिया और वहीं शिफ्ट हो गई । ये बात उन्हें पसंद नहीं आई । वो कभी भी वहाँ रहने नहीं गए । शायद यही वजह रही हो नाइत्तेफ़ाक़ी की लेकिन उन की जिंदगी में एक और लड़की आई, जिस का नाम शमीरा था । कुछ दिनों बाद उनहों ने उस से शादी कर ली । इस पर उन के घर में बड़ा वबाल हुआ, लड़ाई झगड़े हुए, लेकिन उनहों ने शमीरा को तलाक देने से साफ इंकार कर दिया । इस बात से नाराज़ हो कर उन की बीवी ने नींद की बहुत सी गोलियाँ खा लीं । उसे आनन फानन में हस्पताल ले जाया गया, और इलाज शुरू हुआ, लेकिन वो ठीक होने की बजाए कोमा में चली गई । 10 दिन कोमा में रहने के बाद उस का इंतकाल हो गया ।

बाग़ी क़व्वाल - अज़ीज़ नाज़ाँ (क़िस्त 3)


अभी तक वो इस्माईल आज़ाद के साथ कोरस करते आए थे, लेकिन अब उन्हें अपनी पहचान चाहिए थी । इस के लिए उन्हों ने अपने एक दोस्त यूसुफ़ अंदाज़ के साथ मिल कर एक गेम प्लान बनाया । ये दोनों किसी भी बड़े क़व्वाल के प्रोग्राम में पहुँच जाते । वहाँ ये दोनों अलग हो जाते । अब यूसुफ़ अंदाज़ ऑर्गनाइज़र को ढूँढता, उस से मिलता, और बातों बातों में ही उसे बताता, "वो लड़का ( यानी अज़ीज़ ) बहुत अच्छा गाता है । आप एक बार उसे सुनिए, इन सब को भूल जाएंगे ।" इस बात से मुतास्सिर हो कर ऑर्गनाइज़र उन से एक दो कलाम सुनाने का इसरार करता । वो पहले झूठ मूठ कि ना नुकर करते, फिर तैयार हो जाते । एक दो कलाम पेश करते, जो रक़म मिलती उसे बटोरते और चलते बनते । उधर उन कि तूफ़ानी पर्फ़ार्मेन्स के बाद असल क़व्वाल का प्रोग्राम जाम न पाता । थोड़े दिनों में ये बात मशहूर हो गई कि अज़ीज़ क़व्वालों का प्रोग्राम ख़राब कर देता है । 
इधर उन्हों ने रिकॉर्डिंग के लिए जद्दो जहद शुरू कर दी थी । उस वक़्त कोलम्बिया के रेकॉर्ड्स चलन में थे । कोलम्बिया की मेन ब्रांच कोलकाता में थी, और यहाँ मुंबई में भी एक ब्रांच थी । मुंबई ब्रांच के कर्ता धर्ता क़ासिम साहब थे, जो कासू मामा के नाम से मशहूर थे । अज़ीज़ साहब ने जब उन से मुलाक़ात की तो उन्हों ने उन्हें ये कहते हुए रिजैक्ट कर दिया कि तुम्हारी आवाज़ नक्की ( nasal ) है । वो मायूस तो हुए, लेकिन हार मानना उन कि फितरत में नहीं था । यहाँ मुंबई में रिजैक्ट होने के बाद वो कोलकाता जा पहुंचे, वहाँ ऑडिशन दिया और पास हो गए । इस तरह उन कि पहली रिकॉर्डिंग मुंबई के बजाए कोलकाता में हुई । फिर तो एक के बाद एक उन के कई रेकॉर्ड्स बने, लेकिन मुंबई में जब भी उन की रिकॉर्डिंग होती थी, वो कासू मामा को रिकॉर्डिंग रूम से बाहर निकाल देते थे । 
उन की उम्र कोई 16 साल की थी । सांताक्रूज में उन का प्रोग्राम था । एक लड़की उन को बड़े ग़ौर से सुन रही थी । और शेर पसंद आने पर पैसे भी देती थी । उस दिन वहाँ पैसों का ही नहीं, कोई और लेन देन भी हुआ । वो दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे थे । कुछ दिन उन दोनों के बीच रोमैन्स चला, फिर एक दिन उन दोनों ने शादी का फैसला कर लिया । लड़की क्रिश्चियन थी । घर वालों के मानने का तो सवाल ही नहीं था । लेकिन इश्क़ कब किसी की परवाह करता है । उन्हों ने अपने बहनोई को पटाया, उन की मदद से उस लड़की ने इस्लाम क़ुबूल किया और फिर उन्हों ने इन दोनों की शादी करा दी । शादी के बाद वो अपनी नई नवेली दुल्हन को ले कर घर पहुंचे । अब उन की माँ के पास उस को अपनाने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन उन की कभी भी उस से पटी नहीं । 
शादी के बाद ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं तो पैसे कमाने का दबाव भी बढ़ा । इस सिलसिले में उन्हें कई कई दिनों तक कभी नागपुर तो कभी कानपुर में रहना पड़ता था । उन्हीं दिनों की बात है, उन का एक रेकॉर्ड आया था, जिस में उन्हों ने फ़िल्म "नागिन" के गीत "मन डोले मेरा तन डोले " की धुन पर एक क़व्वाली "इल्लल्लाह हक़ इल्लल्लाह" गाई थी । जो उन की कव्वालियों की किताब में शामिल थी । उन्हीं दिनों उन का एक प्रोग्राम कानपुर के ग़म्मू ख़ाँ के अहाते में जानी बाबू के साथ रखा गया । यहाँ जानी बाबू ने एक चाल चली । पहला टर्न उस का था । उस ने ये क़व्वाली पेश कर दी । उस की इस चाल ने अज़ीज़ साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया । वो अपने साथ अपनी किताबें इस प्रोग्राम में बेचने और इस नाते कुछ एक्सट्रा पैसे कमाने की नीयत से ले गए थे । जब उन का टर्न आया तो ग़ुस्से में भरे अज़ीज़ नाज़ाँ ने स्टेज से ये एनॉउंस किया, "अभी अभी जो कलाम जानी साहब ने पेश किया, वो मेरा है, और ये रहा उस का सबूत । और उन्हों ने उस किताब की कापियाँ अवाम में उछाल दीं । फिर क्या था, उन का ये स्टंट काम कर गया और उन का ये प्रोग्राम सुपर हिट रहा । 
उन्हों ने सादिक़ निज़ामी की एक ग़ज़ल की धुन बनाई थी, जो बहुत पसंद की जाती थी, और जिस के बोल थे, "जो दहन से नाला निकल गया ।" 1961 में जब फ़िल्म "धर्म पुत्र" रिलीज़ हुई, तो उन को पता चला कि इस फ़िल्म कि एक क़व्वाली "जो ये दिल दीवान। मचल गया" में उन कि ये धुन उड़ा ली गई थी । फ़िल्म बी॰ आर ॰ चोपड़ा की थी और संगीतकार एन॰ दत्ता थे । वो बहुत मायूस हुए, तड़पे, छटपटाए, लेकिन कुछ न कर सके । बी॰ आर॰ चोपड़ा और एन॰ दत्ता बहोत बड़े लोग थे और अज़ीज़ साहब के पास इतना भी पैसा नहीं था कि एक वकील कर सकें । धुनें तो उन कि बाद में भी कई बार चोरी हुईं, लेकिन इस चोरी से उन को जो तकलीफ़ हुई थी, वो नाक़ाबिले-बर्दाश्त थी । 
इस के अगले साल सन 1962 में उन का रेकॉर्ड "जिया नहीं माना" आया, और बहुत हिट हुआ । यहाँ तक कि एच॰एम॰वी॰ के न्यूज़ लेटर में उन कि फोटो के साथ इस रेकॉर्ड का ज़िक्र था । ये उन कि पहली कामयाबी थी, जिस ने ऊनें एक पहचान दिलाई थी, और उन्हें बड़े क़व्वालों कि सफ़ में ला कर खड़ा कर दिया था । लेकिन उन कि मंज़िल अभी बहुत दूर थी । 
1967 का ज़माना था । नौशाद उस वक़्त फ़िल्म "पालकी" के संगीत पर काम कर रहे थे । एक ग़ज़ल कि धुन बन नहीं पा रही थी । ग़ज़ल के बोल थे, "ऐ शहरे-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है"। अज़ीज़ साहब के उस्ताद मोहम्मद इब्राहीम ख़ाँ साहब जो संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद (पाकीज़ा फ़ेम ) के छोटे भाई थे, नौशाद के एसिस्टेंट थे और अज़ीज़ साहब कि कई धुनें इस से पहले नौशाद साहब को दे चुके थे, जिस में "मेरे महबूब" के गीत "जानेमन इक नज़र देख ले" बतौर ए खास काबिले ज़िक्र है, क्यूँ के ये धुन हिट भी रही थी । एक दिन वो उन्हें नौशाद साहब के यहाँ ले गए । नौशाद ने उन्हें वही ग़ज़ल दी, और उस की धुन बनाने को कहा । उन्हों ने 15 मिनट में उस कि धुन तैयार कर दी, जो सब को बहुत पसंद आई । इस के बाद उन को नौशाद साहब ने बतौर एसिस्टेंट रख लिया । इस फ़िल्म में इस गीत के अलावा जो दूसरा गीत उन्हों ने तैयार किया वो था, "जाने वाले तेरा ख़ुदा हाफ़िज़" । इस के अलावा इस फ़िल्म में दरगाह के एक सीन में बैकग्राउंड में क़व्वाली सुनाई देती है, "न जाऊंगा कभी ख़ाली मेरे वारिस मेरे वाली" ये आवाज़ और धुन भी अज़ीज़ साहब कि ही थी । इसी साल उन्हों ने नौशाद के लिए फ़िल्म "राम और श्याम" में भी 3 धुनें बनाईं, जो थीं "बालम तेरे प्यार कि ठंडी आग में जलते जलते", "तू है साक़ी मैं हूँ शराबी शराबी" और "मैं ने कब तुम से कहा था कि मुझे प्यार करो"। 
1968 में उन्हों ने फ़िल्म "साथी" के लिए "मैं तो प्यार से तेरे पिया मांग सजाऊँगी" के अंतरे तैयार किए । जब कि दो गीतों "ये कौन आया रौशन हो गई" और "हुस्ने जानाँ इधर आ" कि पूरी धुनें उन्हीं की थीं । लेकिन अब नौशाद से उन के रिश्ते बिगड़ने लगे थे । वजह ये थी कि नौशाद उन को क्रेडिट नहीं देते थे । दूसरी बात, धुनें बनवाने के बाद जब वो गायकों के साथ उन कि रिहर्सल और रिकॉर्डिंग करते थे, तो उन्हें बाहर बिठाए रखते थेऔर इस बात का खास खयाल रखते थे कि उन कि किसी से मुलाक़ात न हो, जब कि अज़ीज़ साहब को ये शिकायत थी कि नौशाद धुन कि बारीकियाँ सिंगर पर ज़ाहिर नहीं कर पाते हैं । इसी साल "संघर्ष" आई, जिस के लिए उन्हों ने 3 गाने, "अगर ये हुस्न मेरा", "मेरे पास आओ नज़र तो मिलाओ" और "तस्वीरे-मोहब्बत थी जिस में" बनाए, जो बेहद हिट रहे । उन कि नाराजगी का नौशाद पर असर भी हुआ था, और संघर्ष कि कास्टिंग में उन का नाम नुमायाँ तौर पर दिया गया था, लेकिन "संघर्ष" के बाद वो नौशाद से अलग हो गए ।

बाग़ी क़व्वाल - अज़ीज़ नाज़ाँ (क़िस्त 2)


उस वक़्त क़व्वालियों का दौर दौरा था । फ़िल्म "अलहिलाल" का गीत "हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों ने" हिट हो चुका था, और बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर था । और इस के गायक इस्माईल आज़ाद की क़व्वाली की दुनिया में तूती बोलती थी । उन से मिलने और उन का प्रोग्राम बुक करने के लिए उन के घर के आगे लाइन लगी रहती थी । इत्तफ़ाक़ से इस्माईल आज़ाद उसी मोहल्ले में रहते थे, जिस में अज़ीज़ नाज़ाँ का घर था । कुछ घर वालों की प्रतिष्ठा, कुछ अपने टैलंट के बलबूते पर हुआ नाम, और कुछ इस लिए कि इस्माईल आज़ाद के छोटे भाई क़लंदर आज़ाद से उन कि दोस्ती थी, वजह कुछ भी रही हो, लेकिन इस्माईल आज़ाद के घर उनका आना जाना था । ये बात भी उन के घर वालों को बेहद नागवार थी । एक तो वो लोग सय्यद थे और इस्माईल आज़ाद क़ुरैशी, दूसरे उन का ख़ानदान बहुत मोअज़्ज़िज़ था, जबकि इस्माईल आज़ाद गाने बजाने से तअल्लुक़ रखते थे, जो उस ज़माने में यूँ भी भाँड-मीरासियों का काम समझा जाता था, अच्छे घरों के बच्चों को इस से दूर रहने की हिदायत दी जाती थी, फिर इस्लाम में तो इसे हराम ही क़रार दिया गया है । अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है के अज़ीज़ साहब को किन पाबंदियों का सामना करना पड़ता होगा । दूसरी तरफ़ उन के घर वालों के डर से इस्माईल आज़ाद उन्हें अपने साथ ले जाने को राज़ी न होते । ये एक अलग मसअला था । लेकिन वो भी बला के ज़िद्दी और अपनी धुन के पक्के थे । इस्माईल आज़ाद उन्हें ऐसे अपने साथ न ले जाते तो वो उन के इक्के के पीछे लटक जाते, और किसी न किसी तरह प्रोग्रामों में पहुँच जाते । उन के बड़े भाई याक़ूब सारंग, जिन कि शादी उन की ख़ाला कि बेटी फ़ातिमा से हुई थी, वो अब अपनी ससुराल में ही रहते थे । वो ख़ुद भी सी मेन असोसिएशन में काफ़ी ऊँची पोस्ट पर थे । उन तक जब ये ख़बरें पहुँचतीं तो वो घर आते । उन के आते ही उन कि माँ शिकायतों का दफ़्तर खोल देतीं । नतीजा ये होता कि वो अज़ीज़ साहब की बेंत से सुताई करते । वो अपने भाई का बहुत एहतराम करते थे, इस लिए चुपचाप मार खा लेते । लेकिन उन के जाने के बाद बेंत के निशानों को, जो उन के जिस्म पर पिटाई की बदौलत बने होते थे, ब्लेड से चीर डालते । उन की इस हरकत से उन की माँ दहल जातीं । उन पर हर मुमकिन तरीक़े से नज़र रखी जाती, यहाँ तक कि उन्हें ताले में बंद कर दिया जाता, लेकिन वो थे कि खिड़की के बग़ल से हो कर जाने वाले ड्रेन पाइप के सहारे नीचे उतर जाते और उन की मंज़िल वही होती, इस्माईल आज़ाद का घर । धीरे धीरे इंसमईल आज़ाद ने उन की ज़िद के आगे हार मान ली । उन्हों ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर लिया । वो इस्माईल आज़ाद के साथ कोरस करने लगे ।
इधर उन की माँ उन की हरकतों से बेहद परेशान रहती थीं । उस ज़माने में एक ज़िंदा वली थे । कहा जाता है कि वो एडवोकेट थे, लेकिन किसी तरह उन को अल्लाह ने विलायत बख़्श दी थी । उन को लोग बंडल शाह बाबा के नाम से जानते थे । जब उन कि माँ का उन पर कोई ज़ोर नहीं चला और वो किसी भी तरह अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आए तो एक दिन उन कि माँ उन्हें बंडल शाह बाबा के पास ले गईं । बंडल शाह बाबा खीर खा रहे थे और उन कि मूछें खीर में डूबी जा रही थीं । उन्हों ने वही खीर का कटोरा अज़ीज़ साहब को दे दिया । अज़ीज़ साहब को खीर से कराहियत हो रही थी, लेकिन माँ ने घुड़की दी तो किसी तरह उन्हों ने खीर खा ली । अब उन कि माँ ने बंडल शाह बाबा के सामने उन की शिकायतों का पिटारा खोला । बंडल शाह बाबा ने सारी बातें सुनीं, फिर उन की तरफ़ देखा, मुस्कराए और उन की माँ से कहा, "ये जो करता है इस को करने दो, इस पर पाबंदी मत लगाओ, वर्ना ये पागल हो जाएगा ।"
बस फिर क्या था, उन पर से सारी पाबन्दियाँ हटा ली गईं । अब वो कुछ भी करने के लिए आज़ाद थे । अल्लाह ने संगीत की नेमत उन को दी भी खुले हाथों से थी लेकिन क़व्वाली का फ़न उर्दू का मोहताज था और उन की मादरी ज़ुबान मलयालम थी । स्कूल की पढ़ाई की थी तो वो भी गुजराती मीडियम से । तो अब उन के सामने ये मसअला आ खड़ा हुआ कि उर्दू कैसे सीखें । उन कि ये जुस्तजू उन को सादिक़ निज़ामी तक ले गई ।
सादिक़ निज़ामी बहुत बड़े शायर तो नहीं थे, लेकिन अज़ीज़ साहब को उन से बड़ा सहारा मिला । वो उन्हें बहुत प्यार करते थे । उन्हों ने न सिर्फ उन्हें उर्दू सिखाई, बल्कि शेर-ओ-शायरी को समझना भी सिखाया । वो उन के लिए कलाम भी लिख दिया करते थे और अक्सर कलाम में उन का नाम भी दे देते थे । उन्हें नाज़ाँ तख़ल्लुस भी उन्हों ने ही अता किया था ।

बाग़ी क़व्वाल - अज़ीज़ नाज़ाँ (क़िस्त 1)


बेमिसाल शख़्सियत, नशे में डूबी आवाज़, लाजवाब अंदाज़ और बाग़ियाना तेवर, ग़ुस्सा ऐसा कि हमेशा नाक पर रखा रहे, अख़्लाक़ ऐसा कि दुश्मन भी मुरीद हो जाए और ख़ुलूस ऐसा कि बड़े बड़े इबादतगुज़ार सजदा रेज़ हो जाएँ । कुछ ऐसी ही magnetic शख़्सियत थी अज़ीज़ नाज़ाँ की ।
अज़ीज़ नाज़ाँ साहब मलबार (केरल) के एक सय्यद घराने से तअल्लुक़ रखते थे । उन के वालिद और वालिदा बड़े दीनदार, इबादत गुज़ार और परहेज़गार थे । एक भाई और तीन बहनें उन से बड़े थे और तीन भाई और एक बहन छोटे । उन का ख़ानदान काफी मोअज़्ज़िज़ माना जाता था । आज भी वो गली, जिस में उन का पुश्तैनी मकान है, उन के नाना मोहम्मद इब्राहीम सारंग के नाम से मंसूब है, और एम० ई० सारंग मार्ग के नाम से जानी जाती है । सुना तो ये भी है कि उन के ख़ानदान में उमर क़ाज़ी नाम के कोई वली भी हुए हैं, जिन का मज़ार आज भी केरल के शहर कालीकट में मौजूद है ।
अज़ीज़ नाज़ाँ अपनी तरह के अनोखे ही इंसान थे । बचपन में वो इतने शरीर थे कि उन की माँ को पल पल उन पर नज़र रखनी पड़ती थी । घर में मज़हबी माहौल होने के बावजूद उन को धार्मिक कर्म कांडों से कोई दिलचस्पी नहीं थी । शुरू में जुम्मा जुम्मा नमाज़ पढ़ भी लेते थे, लेकिन बाद में वो भी छोड़ दी । भूख उन को बर्दाश्त नहीं होती थी । घर वाले ज़बरदस्ती रोज़ा रखवा देते रोटी ले कर किसी कोने खांचे में छुप छुपा के खा लेते । जब पकड़े जाते तो पिटाई होती । लेकिन उन्हें न सुधरना था, न वो सुधरे ।
पतंग उड़ाने का उन्हें बहुत शौक़ था । ड्राइंग और पेंटिंग से गहरा लगाव था, और खुद भी बहुत अच्छी ड्राइंग कर लेते थे । पढ़ाई लिखाई से दूर भागते थे लेकिन खेल कूद में हमेशा आगे आगे रहते थे । इस के बावजूद अपनी पुर कशिश और सुरीली आवाज़ की बदौलत स्कूल में वो सब के चहीते थे ।
अभी उन की उम्र नौ साल की ही थी कि उन के वालिद ने इस दुनिया को ख़ैरबाद कह दिया । उन कि माँ अकेली रह गईं । ऊपर से नौ बच्चों कि परवरिश कि जिम्मेदारियाँ । ऐसे में अज़ीज़ साहब के चचा ने, जिन को वो चिच्चा कहते थे, अपना घर बार छोड़ दिया और यहाँ मुंबई में रह कर अपने भाई के कारोबार और बच्चों को संभालने का फ़ैसला कर लिया । उन के वालिद का जनरल स्टोर था । उसी से घर का ख़र्चा चलता था । लेकिन बाप के इंतक़ाल के बाद घर में तंगी रहने लगी । यहाँ तक कि अक्सर उन के कपड़ों में पैवंद लगे रहते । उन के नाना के यहाँ अथाह पैसा था । खाने को अच्छे से अच्छा मिलता था । ऐसे में खाने के शौक़ीन अज़ीज़ अक्सर नानी के घर चले जाते । हालाँकि उन कि ख़ुद्दार माँ ने उन्हें ये सीखा रखा था कि अगर नानी पूछें कि घर में क्या बना था तो कहना कि मुर्ग़ी का सालन । लेकिन इतना छोटा बच्चा अपने जज़्बात क्या छुपाता । उन कि ज़ुबान चाहे जो कहती, उन कि आँखें सारी सच्चाई बयान कर जातीं ।
संगीत से उन्हें लगाव तो जुनून की हद तक था ही । और फिर घर के ऐसे हालात । उन्हों ने उसी छोटी सी उम्र में ऑर्केस्ट्रा में गाना शुरू कर दिया । इस से उन का जेब ख़र्च निकलने लगा । वो लता मंगेशकर के बड़े फ़ैन थे । आवाज़ भी पतली थी । तो वो ऑर्केस्ट्रा में लता जी के गाने गाया करते थे ।
उस ज़माने में भेंडी बाज़ार अदब और मोसीक़ी का मरकज़ हुआ करता था । उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब का घर भी भेंडी बाज़ार में ही था । उन के यहाँ संगीत की महफ़िलें जमती थीं और बड़े बड़े संगीत के उस्ताद उन के यहाँ जलवा अफ़रोज़ होते थे । अज़ीज़ नाज़ाँ भी उन महफ़िलों में शामिल रहते । किसी उस्ताद के पाँव दबाते, किसी का सर । इस बहाने उन्हें संगीत सुनने और सीखने को मिलता । उस वक़्त उन महफ़िलों में उन के जो रिश्ते बने, वो मरते डैम तक क़ायम रहे । अल्लाह रक्खा ख़ाँ साहब, अमीर ख़ाँ साहब, फ़ैयाज़ ख़ाँ साहब, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब वग़ैरह जब तक ज़िंदा रहे, तब तक उन्हें बच्चे की तरह प्यार करते रहे । उन उस्तादों ने उन के अंदर छुपे कलाकार को पहचान लिया था । उन के बारे में उन सब की एक राय थी । अज़ीज़ संगीत की चोरी करता है । वो समझ गए थे के वो उन की ख़िदमत के बहाने संगीत सीखने के ख़्वाहाँ हैं । बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब उन से अक्सर करते, "अज़ीज़, गंडा बँधवा ले ।" वो सुनते, मुस्कराते, और टाल जाते । शायद बचपन की नादानी थी । लेकिन इस बात का अफ़सोस उन्हें ताउम्र रहा कि काश उन्होंने बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब की बात मान ली होती और उन से गंडा बँधवा लेते । लेकिन जब तक उन्हें ये अक़्ल आई, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब इस दुनिया ए फ़ानी को अलविदा कह चुके थे ।

महरूमी की धूप ढली, सर पर दौलत के साए हैं

महरूमी की धूप ढली, सर पर दौलत के साए हैं
राहत का वो दौर गया बेचैनी के दिन आए हैं

कितनी मुद्दत बाद मिली फ़ुरसत दो पल आराम को तो
गिनते रहे कैसे कैसे मौक़े बस मुफ़्त गँवाए हैं

वक़्त ने करवट क्या बदली चेहरे ही सारे बदल गए
कल तक जो अपने से लगते हैं वो आज पराए हैं

जिनको चलना हम ने सिखाया आगे कब के निकल गए
थक कर राह में हम बैठे हैं, रात के गहरे साए हैं

आज हिसाब-ए-रोज़-ओ-शब करने बैठे तो राज़ खुला
सारी उम्र लुटाई है तो कुछ लम्हे हाथ आए हैं

ज़िन्दगी हाथ से छूट के खोई, वक़्त फिसलता जाता है
इस मंज़िल पर साथ में अपने सिर्फ़ क़ज़ा ही लाए हैं

कोई तमन्ना, कोई जज़्बा, कोई ग़म मुमताज़ नहीं
एक दिल-ए-बेहिस है, और हम और अजल के साए हैं


रोज़-ओ-शब रात और दिन, लम्हे पल, क़ज़ा मौत, अजल मौत 

कभी जो मुस्कराए होंठ तो नम हो गईं आँखें

कभी जो मुस्कराए होंठ तो नम हो गईं आँखें
ना जाने कितने मंज़र हैं छुपाए आबगीं आँखें

वो नज़रें छेड़ती हैं तार-ए-उल्फ़त बरबत-ए-जाँ पर
झुकी जाती हैं बार-ए-हुस्न से ये शर्मगीं आँखें

अजब आलम है, बिखरी जाती है हस्ती फ़ज़ाओं में
कहीं अक़्ल और कहीं दिल है, कहीं हम हैं, कहीं आँखें

गुज़र जाएगा दिन, पर रात की वुसअत का क्या कीजे
झपकतीं ही नहीं पल भर को जलती आतिशीं आँखें

ये शग़्ल अहले ज़माना का गुज़रता है गराँ दिल पर
कि जैसे जायज़ा लेती हों सब की नुक्ताचीं आँखें

चलन सिखला गई हैं हम को भी दुनिया में जीने का
जहान-ए-तुंदख़ू की फ़ितना परवर ऐब बीं आँखें

नशे में झूमे कुल आलम, ये क़ुदरत लड़खड़ा जाए
ज़रा मुमताज़ छलका दें जो मै वो आबगीं आँखें


आबगीं शीशे के जैसी चमकीली, बरबत सरोद, शर्मगीं शर्मीली, वुसअत फैलाव, आतिशीं आग के जैसी, शग़्ल शौक, गराँ भारी, नुक्ताचीं ऐब ढूँढने वाली, तुंदख़ू बदमिज़ाज, फ़ितना परवर फ़ितना फैलाने वाली, ऐब बीं ऐब ढूँढने वाली 

ख़्वाहिश

दिल को छलती है ख़्वाहिश कोई
प्यार है आज़माइश कोई
हर क़दम दिल की साज़िश कोई
दिल में जलती है आतिश कोई
ऐ ख़ुदा
ये चाहतें, ये हसरतें
ये अजनबी सी राहतें
ये ग़ुरूर का
वो सुरूर है
दिल सब से है बेगाना

हर हिकायत से अंजान है
जाने दिल क्यूँ परेशान है
कुछ ना बोले ये नादान है
फिर भी मेरी ये पहचान है
ऐ ख़ुदा
ये कोशिशें, ये काविशें
ये सरसरी सी साज़िशें
ना मुझे सता
मेरे दिल बता

क्यूँ हो गया दीवाना 

हर घड़ी पलकों में है बेख़्वाबियों का सिलसिला

हर घड़ी पलकों में है बेख़्वाबियों का सिलसिला
सारा आलम सो रहा है, जागता है रास्ता

एक वो छोटी सी लग़्ज़िश, ज़िन्दगी भर की सज़ा
बन गई जाँ की मुसीबत एक छोटी सी ख़ता

वापसी की राह कोई अब नज़र आती नहीं
आँधियों ने तो मिटा डाले हैं सारे नक़्श-ए-पा

रास क्या आएगा साक़ी मुझ को ये तेरा करम
तश्नगी मेरी कहाँ, ये तेरा मैख़ाना कुजा

रात की वीरान राहों में ये कैसा शोर है
मुझ को पागल कर न दे दिल के धड़कने की सदा

अजनबी एहसास ये कैसा है दिल के चार सू
दर पे दस्तक दे रही है सरफिरी पागल हवा

फिर वही बेहिस सी रातें, फिर वही वीरान दिन
जाँ की गाहक बन गई है वहशतों की इंतेहा

दे के हम को चंद साँसें सारी ख़ुशियाँ लूट लीं
हम को अपनी ज़िन्दगी से है फ़क़त इतना गिला

अब न कोई ग़म, न हसरत है, न कोई दर्द है
रह गया मुमताज़ पैहम रतजगों का सिलसिला


बेख़्वाबी नींद न आना, लग़्ज़िश लड़खड़ाना, नक़्श-ए-पा पाँव के निशान, कुजा कहाँ, चार सू चारों तरफ, बेहिस भावनाशून्य, वहशत घबराहट, फ़क़त सिर्फ़, गिला शिकायत, पैहम लगातार 

मेरा सरमाया ही सारा ले गया मेरा जुनूँ

क्या  मोहब्बत, क्या  रफ़ाक़त, क्या  ख़ुशी, कैसा  सुकूँ
मेरा  सरमाया  ही  सारा  ले  गया  मेरा  जुनूँ

कितने  ही  रंगीन  साए  देखे  थे  कल  ख़्वाब  में
ख़्वाब  की  ताबीर  क्या  दूं, कौन  सा  पैकर  लिखूं

खाए  जाता  है  मुझे  मजबूरियों  का  ये  सफ़र
कब  तलक  ख़ुद को  समेटूं, दर  ब दर  कब  तक  फिरूँ

ये  तेरा  बेशक्ल  रुख़, ऐ  मेरी  बद्ज़न  ज़िन्दगी
तेरी  इस  बेचेहरगी  को  कौन  सा  अब  रंग  दूं

लम्हा  दो  लम्हा  की  राहत  और  सदियों  की  चुभन
ज़िन्दगी  की  तल्खियों में  ये  तमन्ना  का  फुसूँ

तोड़  देता  है  मुसाफ़िर  को  सफ़र  का  इख्तेताम
थक  चुकीं  बेकल  उम्मीदें, आरज़ू  है  सर निगूँ

इम्तेहाँ दर  इम्तेहाँ  दर  इम्तेहाँ  दर  इम्तेहाँ
कौन  सा  अब  इम्तेहाँ  बाक़ी  है, कब  तक  चुप  रहूँ

जाग  उठीं  "मुमताज़" कितनी  ही  बरहना  हसरतें
शब की  तीरा  धज्जियों  से  कितने  पैराहन  बुनूं

पैकर-आकार, फुसूँ- जादू, इख्तेताम-समाप्ति, सर निगूँ- सर झुकाए हुए, बरहना- नग्न, तीरा-अँधेरी, पैराहन-लिबास 

ये कैसा दर्द है

ये कैसा दर्द है कैसी कसक है ये क्यूँ हर   पल   तेरी   यादें मुझे बेचैन रखती हैं तेरी आँखें मेरे दिल पर वफ़ा का नाम लिखती हैं ये ...