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Showing posts from July 7, 2018

दिसंबर के सर्द लम्हे

दिसंबर के हसीं लम्हे लरज़ते शबनमी लम्हे वो अक्सर याद आते हैं वो मंज़र याद आते हैं
सहर के वक़्त का स्कूल और सर्दी का वो मौसम वो पानी बर्फ़ सा जिसकी छुअन से जिस्म जाता जम उँगलियाँ सुन्न हों तो पेंसिल पकड़ी नहीं जाए बजें जब दाँत तो फिर लुत्फ़ दे अदरक की वो चाए
लड़कपन की वो रुख़सत थी जवानी की वो आमद थी हर इक मंज़र सुहाना था हर इक शय ख़ूबसूरत थी
दिसंबर दिन के हर लम्हे मचल कर खिलखिलाता था बदन सूरज की किरनों से हरारत जब चुराता था वो किरनें नर्म थीं कितनी हरारत कितनी नाज़ुक थी हवा की सर्द बाहें छेड़ती थीं उन को छू छू कर तो वो सहमी सी किरनें अपनी गर्मी खेंच लेती थीं सिमट जाती थी नाज़ुक सी शरारत अपने पैकर में दिसंबर का हज़ीं, कमज़ोर सूरज झेंप जाता था तो फिर वह शाम के आँचल में अपना मुँह छुपा लेता सियाही और भी बेबाक हो कर फैलने लगती वो सर्दी रात की पोशाक हो कर फैलने लगती फ़िज़ा कोहरे की चादर ओढ़ कर रूपोश हो जाती हर इक हलचल सहर तक के लिए ख़ामोश हो जाती

पहन लेती ख़मोशी घुँघरू जब झींगुर की तानों के तो सुर कुछ तेज़ हो जाते थे सर्दी के तरानों के तो फिर डरता हुआ सूरज दबे पैरों उभरता था