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तरही ग़ज़ल - है इंतज़ार अना को , मगर नहीं होता

है इंतज़ार अना को , मगर नहीं होता 
कोई भी दांव कभी कारगर नहीं होता 

हज़ार बार खिज़ां आई दिल के गुलशन पे 
ये आरज़ू का शजर बेसमर नहीं होता 

हयात लम्हा ब लम्हा गुज़रती जाती है 
हयात का वही लम्हा बसर नहीं होता 

हकीक़तें कभी आँखों से छुप भी सकती हैं 
हर एक अहल ए नज़र दीदावर नहीं होता 

गुनह से बच के गुज़र जाना जिस को आ जाता 
तो फिर फ़रिश्ता वो होता , बशर नहीं होता 

बिसात ए हक़ पे गुमाँ की न खेलिए बाज़ी 
यक़ीं की राह से शक का गुज़र नहीं होता 

बचा भी क्या है मेरी ज़ात के ख़ज़ाने में 
के बेनावाओं को लुटने का डर नहीं होता 

नियाज़मंदों से ऐसी भी बेनियाज़ी क्या 
"किसी भी बात का उस पर असर नहीं होता "

भटकते फिरते हैं 'मुमताज़ ' हम से ख़ाना ब दोश 
हर एक फ़र्द की क़िस्मत में घर नहीं होता

अना= अहम्, खिज़ां= पतझड़, आरज़ू= इच्छा, शजर= पेड़, बे समर= बिना फल का, हयात= जीवन, लम्हा ब लम्हा= पल पल, हकीक़तें= सच्चाइयाँ, अहल ए नज़र= आँख वाला, दीदावर= देखने का सलीका रखने वाला, गुनह= पाप, बशर= इंसान, ज़ात= हस्ती, बे नवा= ग़रीब, ख़ाना ब दोश= बंजारे, फ़र्द= शख्स.

ہے انتظار انا کو , مگر نہیں ہوتا 
کوئی بھی داؤں کبھی …

ग़ज़ल - मोहब्बतों के देवता, न अब मुझे तलाश कर

फ़ना हुईं  वो  हसरतें  वो  दर्द  खो  चूका  असर
मोहब्बतों  के  देवता,  न  अब  मुझे  तलाश  कर

भटक  रही  है  जुस्तजू  समा'अतें हैं  मुंतशर
न  जाने  किस  की  खोज  में  है  लम्हा  लम्हा  दर  ब दर

ये  खिल्वतें , ये  तीरगी , ये  शब है  तेरी  हमसफ़र
इन  आरज़ी ख़यालों के  लरज़ते सायों  से  न  डर

हयात ए बे  पनाह  पे  हर  इक  इलाज  बे  असर
हैं  वज्द  में  अलालतें  परेशाँ हाल  चारागर

बना  है  किस  ख़मीर  से  अना  का  क़ीमती क़फ़स
तड़प  रही  हैं  राहतें , असीर  है  दिल  ओ  नज़र

पड़ी  है  मुंह  छुपाए  अब  हर  एक  तशना आरज़ू
तो  जुस्तजू  भी  थक  गई , तमाम  हो  गया  सफ़र

तलातुम  इस  क़दर  उठा , ज़मीन  ए  दिल  लरज़  उठी
शदीद  था  ये  ज़लज़ला , हयात  ही  गई  बिखर

हर  एक  ज़र्ब ए वक़्त  से  निगारिशें  निखर  गईं
हर  एक  पल  ने  डाले  हैं  निशान अपने  ज़ात  पर

बस  एक  हम  हैं  और  एक  तन्हा  तन्हा  राह  है
गुज़र  गया  वो  कारवां , बिछड़  गए  वो  हमसफ़र

फ़ना होना= मिटना, ख़मीर= मटेरिअल, अना= अहम्, क़फ़स= पिंजरा, असीर= बंदी, तशना= प्यासी, आरज़ू= इच्छा, जुस्तजू= खोज, तमाम= ख़त्म, मुंतशर= बिखरा हुआ, समा&…

तरही ग़ज़ल - हम झेलने अज़ीज़ों का हर वार आ गए

हम झेलने अज़ीज़ों का हर वार आ गए सीना ब सीना बर सर ए पैकार आ गए
ऐ ज़िन्दगी,  ख़ुदारा हमें अब मुआफ़ कर हम तो तेरे सवालों से बेज़ार आ गए
तमसील दुनिया देती थी जिन के ख़ुलूसकी उन को भी दुनियादारी के अतवार आ गए
यारो, सितम ज़रीफी तो क़िस्मत कीदेखिये कश्ती गई, तो हाथों में पतवार आ गए
घबरा गए हैं अक्स की बदसूरती से अब हम आईनों के शहर में बेकार आ गए
आवारगी का लुत्फ़  भी अब तो हुआ तमाम अब तो सफ़र में रास्ते हमवार आ गए
इतने हक़ीक़तों से गुरेज़ाँ हुए कि अब "हम ख्व़ाब बेचने सर ए बाज़ार आ गए"
अब मुफलिसी की तो कोई क़ीमत न थी, कि हम "मुमताज़" आज बेच के दस्तार आ गए
ہم  جھیلنے  عزیزوں  کا  ہر  وار  آ  گئے سینہ  بہ سینہ  بر سر  پیکار  آ  گئے
اے  زندگی , خدارا  ہمیں  اب  معاف  کر ہم  تو  تیرے  سوالوں  سے  بیزار  آ  گئے
تمثیل  دنیا  دیتی  تھی  جن  کے  خلوص  کی ان  کو  بھی  دنیاداری  کے  اطوار  آ  گئے
یارو  ستم  ظریفی  تو  قسمت  کی

ग़ज़ल - तश्नगी को तो सराबों से भी छल सकते थे

तश्नगी कोतोसराबोंसेभीछलसकते  थे इकइनायतसे  मेरेख़्वाबबहलसकते  थे
तुमनेचाहाहीनहींवर्ना कभीतो  जानां मेरे  टूटेहुएअरमाँ भी  निकलसकते  थे
तुम  को  जानाथाकिसीऔरही  जानिब, माना दोक़दमफिरभी  मेरे  साथतो  चलसकते  थे
काविशोंमेंही  कहींकोईकमीथी , वर्ना येइरादेमेरीक़िस्मतभी  बदलसकते  थे
रासआजाताअगरहमको  अनाकासौदा ख़्वाब  आँखोंकेहक़ीक़त में  भी  ढलसकते  थे
हम  को  अपनीजोअना  का  नसहारामिलता लडखडाएथे  क़दम  यूँ , के  फिसलसकते  थे
इसक़दरसर्दन  होतीजो  अगर  दिलकीफ़ज़ा