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Showing posts from October 11, 2018

उन की मर्ज़ी जो मोहब्बत को अता कहते हैं

उन की मर्ज़ी जो मोहब्बत को अता कहते हैं हम तो मजबूर तमन्ना को वफ़ा कहते हैं
ज़ीस्त ही जब कि सरासर हो अज़ीयत तो फिर मौत को भी ग़म-ए-हस्ती की दवा कहते हैं
खाक को सर पे उठाए जो फिरा करते हैं क्या अजब लोग हैं मिट्टी को ख़ुदा कहते हैं
कहने वालों को तो कुछ चाहिए कहने के लिए क्या हुआ जो हमें कुछ लोग बुरा कहते हैं
अपनी ठोकर पे रहा सारे ज़माने का निज़ाम हम फ़क़ीरों का है अंदाज़ जुदा, कहते हैं
ज़िन्दगी से भी नहीं सब को मोहब्बत यारो साँस लेने को भी कुछ लोग सज़ा कहते हैं
आज कह डाली है हर तल्ख़ हक़ीक़त उन से देखना ये है कि "मुमताज़" वो क्या कहते हैं

मेरी गुस्ताख़ हसरत से ग़मों को सख़्त हैरत है

मेरीगुस्ताख़हसरतसेग़मोंकोसख़्तहैरतहै उधरबेचैनहैक़ुदरत, इधरगर्दिशमेंख़ल्क़तहै
तड़पकरआहकरनाभीमोहब्बतमेंबग़ावतहै करेफ़रियाद, सरफोड़े, यहाँकिसकोइजाज़तहै
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जूनून सा है , कभी इन्क़ेलाब जैसा है

जूनूनसाहै , कभीइन्क़ेलाबजैसाहै हरइकनज़ारारह-ए-दिलकाख़्वाबजैसाहै
मैंइससराबएतज़बज़ुबमेंकबतलकभटकूँ तेरायेलुत्फ़-ओ-करमभीअज़ाबजैसाहै
लगीहै