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Showing posts from March 18, 2019

मरासिम कोई जो बाहम न होंगे

मरासिम कोई जो बाहम न होंगे कोई खद्शात, कोई ग़म न होंगे
गुमाँ की बस्तियाँ मिस्मार कर दो यकीं के सिलसिले मुबहम न होंगे
ख़ुदा के सामने हैं सर-ब -सजदा हमारे सर कहीं भी ख़म न होंगे
निकल आए हैं हम हर कशमकश से ये सदमे अब हमें जानम न होंगे
हमारी क़द्र भी समझेगी दुनिया मगर तब, जब जहाँ में हम न होंगे
मुक़द्दर हम ने ख़ुद अपना लिखा है सितारे हम से क्यूँ बरहम न होंगे
मुझे तू जैसे चाहे आज़मा ले "मेरे जज़्बात-ए-उल्फ़त कम न होंगे"
यहाँ "मुमताज़" ठहरी हैं खिज़ाएँ यहाँ अब ख़्वाब के मौसम न होंगे
marasim koi jo baaham na honge koi khadshaat, koi gham na honge
gumaaN ki bastiyaaN mismaar kar do