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तस्वीर-ए-ज़िन्दगी में धनक रंग भर गए

तस्वीर-ए-ज़िन्दगी में धनक रंग भर गए ख़ुशबू के क़ाफ़िले मेरे दिल से गुज़र गए
सैलाब कितने आज यहाँ से गुज़रगए आँखों में जो बसे थे, सभी ख़्वाब मर गए
दर दर फिरी हयात सुकूँ के लिएमगर वहशत हमारे साथ रही, हम जिधर गए
सीने में कुछ तो टीसता रहता है रोज़-ओ-शब मजबूरियों के यूँ तो सभी ज़ख़्म भर गए
नाज़ुक से ख़्वाब जल के कहीं ख़ाक हो न जाएँ हम जलती आरज़ू की तमाज़त से डर गए
पैकर वो रौशनी का जो उतरा निगाह में कितने हसीन ख़्वाब नज़र में सँवर गए
सैलाब ऐसा आया वफ़ा केजहानमें "दिल में उतरने वाले नज़र से उतर गए"
जिन से ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया जवान थी "मुमताज़" वो हसीन नज़ारे किधर गए
tasweer e zindagi meN dhanak rang bhar gae khushboo ke qaafile mere dil se guzar gae

रतजगों से ख्वाब तक (मेरी किताब का पेश लफ़्ज़)‎

रतजगे और ख़्वाब मेरी ज़िन्दगी के साथ साथ चलते रहे हैं। कभी रतजगे ख़्वाब ओढ़ कर मिले, तो कभी ख़्वाबों की रौशनी रतजगों में ढल गई। जागती आँखों से ख़्वाब देखने का सिलसिला मेरे बचपन में ही शुरू हो गया था। ज़िन्दगी की हक़ीक़त की तमाज़त से घबरा कर अक्सर मैं ख़्वाबों के साये में पनाह ढूँढ लेती। उस वक़्त इन ख़्वाबों को पैकर में ढालना नहीं आता था मुझे। लेकिन वक़्त के साथ साथ ख़्वाबों की तरतीब में भी मतानत आने लगी, और मेरे मिज़ाज में भी, और फिर ये ख़्वाब शेरों की शक्ल में ढल कर काग़ज़ पर बिखरने लगे। वक़्त का कारवाँ कभी रुकता नहीं है, और ज़िन्दगी का सफ़र हर हाल में जारी रहता है। मेरी ज़िन्दगी का सफ़र भी लम्हा दर लम्हा, माह दर माह, और फिर साल दर साल जारी रहा, और इस के साथ ही साथ हक़ीक़तों की तमाज़त शिद्दत इख़्तियार करती गई। वक़्त का कारवाँ जाने किन किन मोड़ों से गुज़र कर आगे बढ़ता गया, जाने कितने हमसफ़र मिले, जाने कितने बिछड़ते रहे, लेकिन मेरे ख़्वाबों के साये मेरे साथ साथ चलते रहे। शायद यही वजह थी कि मेरा वजूद हक़ीक़त की तमाज़त में झुलस कर खाक न होने पाया, लेकिन ख़्वाबों के सायों की ठंडक इस आंच में जल गई और मेरे ख़्वाब भी सुलग उठे, और …

बेज़ारी की बर्फ़ पिघलना मुश्किल है

बेज़ारीकीबर्फ़पिघलनामुश्किलहै ख़्वाबोंसेदिलआजबहलनामुश्किलहै
तुन्द हवाओंसेलर्ज़ाँहैशम्म-ए-यक़ीं इसआंधीमेंदीपयेजलनामुश्किलहै
हरजानिबहैआग, सफ़रदुशवारहैअब जलतीहैयेराह, कि चलनामुश्किलहै
आगकीबारिश, ख़ौफ़ केदरियाकासैलाब इसमौसममेंघरसेनिकलनामुश्किलहै
गर्महैक़त्लओग़ारत काबाज़ारअभी येजाँकाजंजालतोटलनामुश्किलहै
उल्फ़तकीअबछाँवतलाशकरोयारो नफ़रतकाख़ुर्शीदतोढलनामुश्किलहै

नफ़रतों का ये नगर मिस्मार होना चाहिए

नफ़रतों का ये नगर मिस्मार होना चाहिए अब मोहब्बत का खुला इज़हार होना चाहिए
एकता की कश्तियाँ मज़बूत कर लो साथियो अब त'अस्सुब का ये दरिया पार होना चाहिए
टूटे मुरझाए दिलों को प्यार से सींचो, कि अब रूह का रेग ए रवाँ गुलज़ार होना चाहिए
मुल्क देता है सदा, ऐ मेरे हमवतनो, उठो सो लिए काफ़ी, बस अब बेदार होना चाहिए
खौफ़ का सूरज ढले, सब के दिलों में हो यक़ीं है नहीं, लेकिन ये अब ऐ यार, होना चाहिए
कब तलक "मुमताज़" बेजा हरकतों का इत्तेबाअ हर सदा पर हाँ ? कभी इनकार होना चाहिए
nafratoN ka ye nagar mismaar hona chaaiye ab mohabbat ka khula izhaar hona chaahiye
zulmaton ka ye safar hamwaar hona chaahiye "aadmi ko aadmi se pyar hona chaahiye"

ख़ंजर हैं तअस्सुब के, और खून की होली है

ख़ंजर हैंतअस्सुबके, औरखून कीहोलीहै हमनेयेविरासतअबऔलादकोसौंपीहै
तारीकबयाबाँमेंयेकैसीतजल्लीहै येदिलकीसियाहीमेंक्याशयहैजोजलतीहै
जोहारेवोपाजाए, येइश्क़कीबाज़ीहै जबख़ुदकोगंवायाहै, तबजंगयेजीतीहै
हैदूरअभीसाहिल, तयहोतोसफ़रकैसे रूठाहुआमांझीहै, टूटीहुईकश्तीहै
बेताबजुनूँकायेअदनासाकरिश्माहै देहलीज़पेहसरतकीतक़दीरसवालीहै
देखाजोज़रामुड़के

दिल पे चलता ही नहीं अब कोई बस

दिल पे चलता ही नहीं अब कोई बस आरज़ू होती नहीं हैटससेमस
दौर-ए-हाज़िर का ये सरमाया है बस खुदसरी, मतलब परस्ती और हवस
ये गुज़र जाता है ठोकर मार कर कब किसी का वक़्त पर चलता है बस
आशियाँ की आंच पहुंची है यहाँ तीलियाँ तपती हैं, जलता है क़फ़स
डूबजाएनाउम्मीदीकाजहाँ आज ऐ बारान-ए-रहमत यूँ बरस
सूखता जाता है दिल का आबशार ज़िन्दगी में अब कहाँ बाक़ी वो रस
मैं करूँ फ़रियाद? नामुमकिन, तो क्यूँ "कोई खाए मेरी हालत पर तरस"
है यक़ीं ख़ुद पर तो फिर "मुमताज़" जी क्यूँ भला दिल में है इतना पेश-ओ-पस

ज़हन-ए-बेहिस को जगा दे वो तराना चाहिए

ज़हन-ए-बेहिस को जगा दे वो तराना चाहिए जीत का इक ख़्वाब आँखों में सजाना चाहिए
दिल के सोने को बनाना है जो कुंदन, तो इसे आतिश-ए-जहद-ए-मुसलसल में तपाना चाहिए
रंज हो या उल्फ़तें हों, हसरतें हों या जुनूँ कोई भी जज़्बा हो लेकिन वालेहाना चाहिए
पेट की आतिश में जल जाता है हर ग़म का निशाँ ज़िन्दगी कहती है, मुझ को आब-ओ-दाना चाहिए
दिल तही, आँखें तही, दामन तही, लेकिन मियाँ आरज़ूओं को तो क़ारूँ का ख़ज़ाना चाहिए
अक़्ल कहती है, क़नाअत कर लूँ अपने हाल पर और बज़िद है दिल, उसे सारा ज़माना चाहिए
रफ़्ता रफ़्ता हर ख़ुशी “मुमताज़” रुख़सत हो गई अब तो जीने के लिए कोई बहाना चाहिए
आतिश-ए-जहद-ए-मुसलसल - लगातार जद्द-ओ-जहद की आग, आब-ओ-दाना - दाना -पानी, क़नाअत - संतोष, बज़िद - ज़िद पर आमादा, रफ़्ता रफ़्ता - धीरे-धीरे, रुख़सत - विदा

zahn-e-behis ko jagaa de wo taraana chaahiye
jeet ka ik khwaab aankhoN meN sajaana chaahiye

dil ke sone ko banaana hai jo kundan, to ise
aatish-e-jahd-e-musalsal meN tapaana chaahiye

ranj ho ya ulfateN hoN, hasrateN hoN ya junooN
koi bhi jazba ho lekin waalehaana chaahiye

pet ki aatish meN jal jaata hai har gham …