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दो ख़याल

दो ख़याल 1- मोहब्बत एक नाज़ुक चीज़ है, मासूम जज़्बा है मोहब्बत दिल की धड़कन है, खुली आँखों का सपना है मोहब्बत से ये दुनिया है 2- मोहब्बत झूठ है, धोका है, शहवत है, छलावा है जला दे रूह तक को जो ये इक ऐसा शरारा है मोहब्बत सिर्फ़ फ़ितना है 1- जीने की ख़्वाहिश है तो इक बार मर कर देख ले देखनी हो जिस को जन्नत इश्क़ कर के देख ले 2- इश्क़ में जन्नत नहीं लाखों जहन्नम हैं निहाँ इश्क़ दे जाता है दिल पर ज़िंदगी भर को निशां 1- इश्क़ जब मेहरबान होता है सारा आलम जवान होता है कहकशाँ लगती है हर राहगुज़र पाँव में आसमान होता है 2- इश्क़ जब मेहरबान होता है दिल का दुश्मन जहान होता है शोले राहों में बिखर जाते हैं ख़त्म नाम-ओ-निशान होता है 1- दो दिन की ज़िन्दगानी बेकार न हो जाए इसे प्यार में बिता ले

फ़र्श से अफ़लाक तक पहुंची है रुसवाई मेरी

फ़र्श से अफ़लाक तक पहुंची है रुसवाई मेरी जाने क्यूँ बेचैन रक्खे सब को दानाई मेरी فرش سے افلاک تک پہنچی ہے رسوائی مری جانے کیوں بے چین رکھے سب کو دانائی مری
कोई साया भी पड़े मुझ पर तो दम घुटता है अब मुझ को तन्हा एक पल छोड़े न तनहाई मेरी کوئی سایہ بھی پڑے مجھ پر تو دم گھٹتا ہے اب مجھ کو تنہا ایک پل چھوڑے نہ تنہائی مری
जिस जगह मैं हूँ, वहाँ कोई नज़र आता नहीं क़ैद मुझ को रात दिन रखती है यकताई मेरी جس جگہ میں ہوں وہاں کوئی نظر آتا نہیں قید مجھ کو رات دن رکھتی ہے یکتائی مری
कोई क्या समझे मेरे दिल की तहों के ज़ाविए ख़ुद मुझे कब नापनी आई है गहराई मेरी کوئی کیا سمجھے مرے دل کی تہوں کے زاوئے خود مجھے کب ناپنی آئی ہے گہرائی مری
वक़्त आया तो किसी दीवार का साया न था हाँ, यही दुनिया रही बरसों, तमाशाई मेरी وقت آیا تو کسی دیوار کا سایہ نہ تھا ہاں یہی دنیا رہی برسوں تماشائی مری
उस का वादा था करेगा हर दुआ हर दम क़ुबूल मांगती हूँ, तो नहीं होती है सुनवाई मेरी اُس کا وعدہ تھا، کریگا ہر دعا ہر دم قبول مانگتی ہوں تو نہیں ہوتی ہے شنوائی مری
रास्ता लंबा है, मंज़िल का निशां कोई नहीं चलने दे लेकिन न मुझ को आबलापाई मेरी

उठा है फिर रूह में तलातुम, कहीं नज़र में उतर न आए

उठा है फिर रूह में तलातुम, कहीं नज़र में उतर न आए शदीद है दर्द की तमाज़त, कहीं मेरी आँख भर न आए اُٹھا ہے پھر روح میں طلاطم کہیں نظر میں اتر نہ آئے شدید ہے درد کی تمازت کہیں مری آنکھ بھر نہ آئے
ये ग़ार दिल का है कितना गहरा कि इस जगह अब सहर न आए न जाने मैं किस मक़ाम पर हूँ कि अपनी भी अब ख़बर न आए یہ غار دل کا ہے کتنا گہرا کہ اس جگہ اب سحر نہ آئے نہ جانے میں کس مقام پر ہوں کہ اپنی بھی اب خبر نہ آئے
मचल रही है फिर एक हसरत, कि दिल को धड़का लगा हुआ है ज़रा अभी दर्द कम हुआ है, ये ज़ख़्म फिर से उभर न आए مچل رہی ہے پھر ایک حسرت کہ دل کو دھڑکا لگا ہوا ہے ذرا ابھی درد کم ہوا ہے یہ زخم پھر سے ابھر نہ آیے
समेट कर बिखरे बाल-ओ-पर को फ़लक की जानिब फिर उड़ चली हूँ ग़म-ए-ज़माना को कोई रोको, जुनून के पर कतर न आए سمیٹ کر بکھرے بال و پر کو فلک کی جانب پھر اُڑ چلی ہوں غمِ زمانہ کو کوئی روکو، جنون کے پر کتر نہ آئے
पिरो के हम आँख के सितारे सजाया करते हैं महफ़िलों को

तिलिस्म-ए-आरज़ू से ज़ीस्त को मस'हूर रहने दो

तिलिस्म-ए-आरज़ू से ज़ीस्त को मस'हूर रहने दो हमें दुनिया के ज़ेर-ओ-बाम से मफ़रूर रहनेदो طلسمِ آرزو سے زیست کو مسحور رہنے دو ہمیں دنیا کے زیر و بام سے مفرور رہنے دو
मुबारक तुम को सैराबी,हमें मजबूर रहनेदो हमारी पस्तहाली परसितमभरपूररहनेदो مبارک تم کو سیرابی، ہمیں مجبور رہنے دو ہماری پست حالی پر ستم بھرپور رہنے دو
अगर आज़ाद हो तो ज़िन्दगी दुशवार करडाले बड़ी सरकश तमन्ना है, इसे महसूर रहनेदो اگر آزاد ہو تو زندگی دشوار کر ڈالے بڑی سرکش تمنا ہے، اِسے محصور رہنے دو
है तुममें हौसलातोतुम ही मंजिल तक पहुँच जाओ हमारा क्या, हमें यूँ ही थकन से चूर रहने दो ہے تم میں حوصلہ تو تم ہی منزل تک پہنچ جاؤ ہمارا کیا، ہمیں یوں ہی تھکن سے چور رہنے دو
सियासत के लिए हैं और भी महवर ज़मानेमें अदब को तो सियासत से ज़रा तुम दूर रहने दो

जब मिला हम से, सज़ा वो ही पुरानी दे गया

जब मिला हम से, सज़ा वो ही पुरानी दे गया दिल को दर्द-ए-बेकराँ, आँखों को पानी दे गया جب ملا ہم سے، سزا وہ ہی پرانی دے گیا دل کو دردِ بیکراں، آنکھوں کو پانی دے گیا
जाने किन नज़रों से उस ने आज देखा था मुझे बेनवा जज़्बात को गहरे मआनी दे गया جانے کِن نظروں سے اس نے آج دیکھا تھا مجھے بےنوا جذبات کو گہرے معانی دے گیا
गो ज़ुबां ख़ामोश थी, फिर भी कई बातें हुईं बेज़ुबां आँखों को वोसादाबयानी दे गया گو زباں خاموش تھی، پھر بھی کئی باتیں ہوئیں بے زباں آنکھوں کو وہ سادہ بیانی دے گیا
नाम अपना लिख गय़ा है वो किताब-ए-ज़ीस्त पर आज वो क़रतास-ए-दिल को इक कहानी दे गया نام اپنا لکھ گیا ہے وہ کتابِ زیست پر آج وہ قرطاسِ دل کو اک کہانی دے گیا
कोंपलेँ फिर फूट आईं, फिर बहार आने को है संगलाख़-ए-दिल को इक चादर वो धानी दे गया کونپلیں پھر پھوٹ آئیں، پھر بہار آنے کو ہے