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है अधूरा आदमीयत का निज़ाम

है अधूरा आदमीयत का निज़ाम हर बशर है आरज़ूओं का ग़ुलाम
आज फिर देखा है उस ने प्यार से आज फिर दिल आ गया है ज़ेर-ए-दाम
तोडना होगा तअस्सुब का ग़ुरूर है ज़रूरी इस नगर का इनहेदाम
हाय रे एहल-ए-ख़िरद की चूँ-ओ-चीं वाह, ये दीवानगी का एहतेशाम
थक गए हो क्यूँ अभी से दोस्तो बस, अभी तक तो चले हो चार गाम
देखते हैं, आगही क्या दे हमें अब तलक तो आरज़ू है तशनाकाम
आदमी की बेकराँ तन्हाइयाँ चार सू फैला हुआ ये अज़दहाम
ज़िन्दगी से जंग अब हम क्या करें

न जाने किस का ये दिल इंतज़ार करता है

हर एक शब जो सितारे शुमार करता है न जाने किस का ये दिल इंतज़ार करता है
जो नोच लेता है शाख़ों से बाग़बाँ कलियाँ तड़प के आह-ओ-बुका ख़ार ख़ार करता है
हमें यक़ीं है जो मेहनत की कारसाज़ी पर नसीब अपनी ख़ुशामद हज़ार करता है
जले नहीं हैं जो घर उन को ये ख़बर कर दो हेरास का भी कोई कारोबार करता है
हमेशा जागता रहता है मेरा ज़ेहन कि ये फ़रेब-ए-दिल से मुझे करता है
जफ़ा शआर है “मुमताज़” मतलबी दुनिया वफ़ा का कौन यहाँ ऐतबार करता है शुमार करता है-गिनता है, आह-ओ-बुका-रोना चिल्लाना, ख़ार-काँटा, हेरास-डर, आशकार-आगाह, जफ़ा शआर-जिस का दस्तूर बेवाफ़ाई हो

अश्क आँखों में, तो हाथों में ख़ला रक्खे हैं

अश्क आँखों में, तो हाथों में ख़ला रक्खे हैं हम हैं दीवाने, मुक़द्दर को ख़फ़ा रक्खे हैं
खौफ़ है, यास है, अंदेशा है, मजबूरी है ज़हन-ओ-दिल पर कई दरबान बिठा रक्खे हैं
हक़ की इक ज़र्ब पड़ेगी तो बिखर जाएंगे दिल में हसरत ने सितारे जो सजा रक्खे हैं
खुल गई जो तो बिखर जाएगी रेज़ा रेज़ा बंद मुट्ठी में शिकस्ता सी अना रक्खे हैं
वो जो करते हैं, वो करते हैं दिखा कर मुझ को लाख रंजिश हो, मगर पास मेरा रक्खे हैं
सब्र की ढाल प् शमशीर-ए-मुसीबत झेलो वो, कि तकलीफ़ के पर्दे में जज़ा रक्खे हैं

नज़्म- सवाल

एकबेटीनेयेरोकरकोखसेदीहैसदा मैंभीइकइंसानहूँ, मेराभीहामीहैख़ुदा कबतलकनिस्वानियतकाकोखमेंहोगाक़िताल बिन्तए