संदेश

March 15, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - मुक़द्दर से ये अबके बार दिल जो जंग हारा है

मुक़द्दर से ये अबके बार दिल जो जंग हारा है तमन्ना रेज़ा रेज़ा है, मोहब्बत पारा पारा है MUQADDAR SE YE AB KE BAARDIL JO JANG HAARA HAI TAMANNA REZA REZA HAI MOHABBAT PARA PARA HAI
बड़ी मेहनत से जश्न-ए-आरज़ू के वास्ते जानाँ तेरी यादों से मैं ने दिल की गलियों को सँवारा है BADI MEHNAT SE JASHN E AARZOO KE WAASTE JAANAN TERI YAADON SE MAIN NE DIL KI GALIYON KO SANWAARA HAI
पिये जाते है हम कब से समंदर अश्क का लेकिन मिटेगी तिश्नगी कैसे, ये पानी भी तो खारा है PIYE JAATE HAIN KAB SE HAM SAMANDAR ASHK KA PHIR BHI MITEGI TASHNAGI KAISE YE PAANI BHI TO KHARA HAI
कभी तो आके फिर इक बार वो राहत ज़रा दे दे तुझे ऐ ज़िन्दगी, दिल की जलन ने फिर पुकारा है KABHI TO AA KE PHIR IK BAAR WO RAAHAT ZARA DE DE TUJHE AY ZINDAGI DIL KI JALAN NE PHIR PUKAARA HAI
मुनासिब है अभी हम हौसले अपने बचा रक्खें भटकती है अभी कश्ती, अभी डूबा किनारा है MUNASIB HAI ABHI HAM HAUSLE APNE BACHA RAKHEN BHATAKTI HAI ABHI KASHTI ABHI DOOBA KINAARA HAI
गुज़रता ही नहीं है ज़िन्दगी का एक वो लम्हा मोहब्बत का वो इक लम्हा जो शो’ला है, शरारा है GUZARTA HI NAHIN…