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ग़ज़ल - मसर्रतों की ज़मीं पर ये कैसी शबनम है

मसर्रतों की ज़मीं पर ये कैसी शबनम है ग़ुबार कैसा है सीने में, मुझ को क्या ग़म है MASARRATO'N KI ZAMEE'N PAR YE KAISI SHABNAM HAI GHUBAAR KAISA HAI SEENE ME'N, MUJH KO KYA GHAM HAI
क़दम क़दम पे बिछे हैं हज़ारों ख़ार यहाँ ज़रा संभल के चलो, रौशनी अभी कम है QADAM QADAM PE BICHHE HAI'N HAZAARO'N KHAAR YAHA'N ZARA SAMBHAL KE CHALO, ROSHNI ABHI KAM HAI
ज़रा जो हँसने की कोशिश की, आँख भर आई शगुफ़्ता ख़ुशियों पे महरूमियों का मौसम है ZARAA JO HANSNE KI KOSHISH KI, AANKH BHAR AAI SHAGUFTAA KHUSHIYO'N PE MEHROOMIYO'N KA MAUSAM HAI
थकी थकी सी तमन्ना, उदास उदास उम्मीद बुझा बुझा सा कई दिन से दिल का आलम है THAKI THAKI SI TAMANNA, UDAAS UDAAS UMMEED BUJHA BUJHA SA KAI DIN SE DIL KA AALAM HAI
जलन से तपने लगी है फ़ज़ा-ए-सहरा-ए-दिल हर एक साँस मेरी ज़िन्दगी का मातम है JALAN SE TAPNE LAGI HAI FIZAA E SEHRA E DIL HAR EK SAANS MERI ZINDGI KA MAATAM HAI
खिली खिली सी हँसी पर जमी जमी सी ख़लिश तरब के ज़ख़्म पे ख़ुशफ़हमियों का मरहम है KHILI KHILI SI HANSI PAR JAMI JAMI SI KHALISH TARAB KE ZAKHM PE KHUSHFEHMIYO&#…

ग़ज़ल - जब यार पुराने मिलते हैं

माज़ी के निशाँ और हाल का ग़म जब एक ठिकाने मिलते हैं कुछ और चुभन बढ़ जाती है जब यार पुराने मिलते हैं
MAAZI KE NISHAA'N AUR HAAL KA GHAM JAB EK THIKAANE MILTE HAI'N KUCHH AUR CHUBHAN BADH JAATI HAI, JAB YAAR PURAANE MILTE HAI'N
कुछ दर्द के तूफ़ाँ उठते हैं, कुछ आग ख़ुशी की जलती है इक हश्र बपा हो जाता है जब दोनों ज़माने मिलते हैं KUCHH DARD KE TOOFAA'N UTHTE HAI'N KUCHH AAG KHUSHI KI JALTI HAI IK HASHR BAPAA HO JAATA HAI, JAB DONO'N ZAMAANE MILTE HAI'N
उस लज़्ज़त से महरूम हुए गो एक ज़माना बीत गया अब भी वो हमें महरूमी का एहसास दिलाने मिलते हैं US LAZZAT SE MEHROOM HUE GO EK ZAMAANA BEET GAYA AB BHI WO HAME'N MEHROOMI KA EHSAAS DILAANE MILTE HAI'N
घर छोड़ के जाना पड़ता है, दिन रात मिलाने पड़ते हैं पुरज़ोर मशक़्क़त से यारो कुछ रिज़्क़ के दाने मिलते हैं GHAR CHHOD KE JAANA PADTA HAI, DIN RAAT MILAANE PADTE HAI'N PURZOR MASHAQQAT SE YAARO, KUCHH RIZQ KE DAANE MILTE HAI'N
अब तक तो फ़ज़ा-ए-ज़हन में भी वीरान ख़िज़ाँ का मौसम है देखें तो बहारों में अबके क्या ख़्वाब न जाने मिलते हैं AB T…

ग़ज़ल - शब का इक एक पल पिघलता है

शब का इक एक पल पिघलता है जब भी सूरज नया निकलता है
SHAB KA IK EK PAL PIGHALTA HAI JAB BHI SOORAJ NAYA NIKALTA HAI
जब भी माज़ी का जायज़ा लीजे ज़हन का कोना कोना जलता है JAB BHI MAAZI KA JAAIZA LIJE ZEHN KA KONA KONA JALTA HAI
मिलना अहबाब से तो दूर, अब तो ज़िक्र भी दोस्तों का खलता है MILNA EHBAAB SE TO DOOR, AB TO ZIKR BHI DOSTON KA KHALTA HAI
अब करें क्या हयात की सूरत ज़हन में इक सवाल उबलता है AB KAREN KYA HAYAAT KI SOORAT IK ZEHN MEN SAWAAL UBALTA HAI
वो मक़ाम आ गया जहाँ से अब अपना हर रास्ता बदलता है WO MAQAAM AA GAYA JAHAN SE AB APNA HAR RAASTA BADALTA HAI
हर ख़ुशी, हर तमन्ना, हर जज़्बा दिल को सूरत बदल के छलता है HAR KHUSHI, HAR TAMANNA, HAR JAZBA DIL KO SOORAT BADAL KE CHHALTA HAI
सिर्फ़ शम’अ नहीं अब इस घर में रात भर दिल भी साथ जलता है IK SHAMA'A HI NAHIN AB IS GHAR MEN RAAT BHAR DIL BHI SAATH JALTA HAI
बारहा टूट कर भी दिल वो है फिर धड़कता है, फिर मचलता है BAARHAA TOOT KAR BHI DIL WO HAI PHIR DHADAKTA HAI, PHIR MACHALTA HAI
कोई एहसास, न अरमाँ, न उम्मीद आज कल दिल में दर्द पलता है KOI EHSAAS NA ARMAA'N N…

ग़ज़ल - ये बोझ ज़हन पे रक्खा है मसअले की तरह

ये बोझ ज़हन पे रक्खा है मसअले की तरह ज़मीर जागता रहता है आईने की तरह
YE BOJH ZEHN PE RAKHA HAI MAS'ALE KI TARAH ZAMEER JAAGTA REHTA HAI AAINE KI TARAH
था लेन देन का सौदा, हज़ार शर्तें थीं किया था इश्क़ भी हमने मुआहिदे की तरह THA LEN DEN KA SAUDA, HAZAAR SHARTE'N THI'N KIYA THA ISHQ BHI HAM NE MUAAHIDE KI TARAH
बहुत सुकून में वहशत सी होने लगती है हमें तो दर्द-ओ-अलम भी है मशग़ले की तरह BAHOT SUKOON ME'N WEHSHAT SI HONE LAGTI HAI HAME'N TO DARD O ALAM BHI HAI MASHGHALE KI TARAH
ज़रा जो वक़्त मिला तो इधर भी देख लिया तेरी हयात में हम थे, प हाशिये की तरह ZARA JO WAQT MILA TO IDHAR BHI DEKH LIYA TERI HAYAAT ME'N HAM THE, PA HAASHIYE KI TARAH
करे सलाम भी एहसान की तरह अक्सर हमारा हाल भी पूछे तो वो गिले की तरह KARE SALAM BHI EHSAAN KI TARAH AKSAR HAMARA HAAL BHI POOCHHE TO WO GILE KI TARAH
हमेशा लड़ते रहे वक़्त के थपेड़ों से हयात सारी की सारी थी ज़लज़ले की तरह HAMESHA LADTE RAHE WAQT KE THAPEDO'N SE HAYAAT SAARI KI SAARI THI ZALZALE KI TARAH
ज़रा कुछ अपनी सुनाता, ज़रा मेरी सुनता कभी तो राब्त…

ग़ज़ल - कोई हिकमत न चली, कोई भी दरमाँ न चला

कोई हिकमत न चली, कोई भी दरमाँ न चला पुर नहीं होता किसी तौर मेरे दिल का ख़ला
KOI HIKMAT NA CHALI KOI BHI DARMAA'N NA CHALA PUR NAHIN HOTA KISI TAUR MERE DIL KA KHALAA
तो तमन्नाओं की क़ुर्बानी भी काम आ ही गई सुर्ख़रू हो के चलो आज का सूरज भी ढला TO TAMANNAO'N KI QURBAANI BHI KAAM AA HI GAI SURKHROO HO KE CHALO AAJ KA SOORAJ BHI DHALAA
मुंतज़िर घड़ियों की राहें जो हुईं लामहदूद लम्हा लम्हा था तवील इतना कि टाले न टला MUNTAZIR GHADIYO'N KI RAAHE'N JO HUI'N LAAMEHDOOD LAMHAA LAMHAA THA TAWEEL ITNA KE TAALE NA TALAA
आज भी हम ने तुझे याद किया है जानम दिल के ज़ख़्मों पे नमक आज भी जी भर के मला AAJ BHI HAM NE TUJHE YAAD KIYA HAI JAANAM DIL KE ZAKHMO'N PE NAMAK AAJ BHI JEE BHAR KE MALAA
अब हुकूमत में अना की तो यही होना था दिल को बहलाया बहुत, ख़ूब तमन्ना को छला AB HUKOOMAT ME'N ANAA KI O YAHI HONA THA DIL KO BEHLAAYA BAHOT, KHOOB TAMANNA KO CHHALAA
तश्नगी का ये सफ़र और कहाँ ले जाता मुझ को ले आया सराबों में मेरा कर्ब-ओ-बला TASHNAGI KA YE SAFAR AUR KAHA'N LE JAATA MUJH KO LE AAYA SARAABO'N M…

ग़ज़ल - दिन ज़िन्दगी के हमने गुज़ारे कुछ इस तरह

रक्खे हों दिल पे जैसे शरारे, कुछ इस तरह दिन ज़िन्दगी के हमने गुज़ारे कुछ इस तरह
RAKKHE HO'N DIL PE JAISE SHARAARE, KUCHH IS TARAH DIN ZINDGI KE HAM NE GUZAARE KUCHH IS TARAH
हस्ती है तार तार, तमन्ना लहू लहू हम ज़िन्दगी की जंग में हारे कुछ इस तरह HASTI HAI TAAR TAAR, TAMANNA LAHOO LAHOO HAM ZINDGI KI JUNG ME'N HAARE KUCHH IS TARAH
मिज़गाँ से जैसे टूट के आँसू टपक पड़े टूटे फ़लक से आज सितारे कुछ इस तरह MIZGAA'N SE JAISE TOOT KE AANSOO TAPAK PADE TOOTE FALAK SE AAJ SITAARE KUCHH IS TARAH
हसरत, उम्मीद, ख़्वाब, वफ़ा, कुछ न बच सका बिखरे मेरे वजूद के पारे कुछ इस तरह HASRAT, UMMEED, KHWAAB, WAFAA, KUCHH NA BACH SAKA BIKHRE MERE WAJOOD KE PAARE KUCHH IS TARAH
सेहरा की वुसअतों में फ़रेब-ए-सराब था करती रही हयात इशारे कुछ इस तरह SEHRA KI WUS'ATO'N ME'N FAREB E SARAAB THA KARTI RAHI HAYAAT ISHAARE KUCHH IS TARAH
हम से बिछड़ के जैसे बड़ी मुश्किलों में हो माज़ी पलट के हमको पुकारे कुछ इस तरह HAM SE BICHHAD KE JAISE BADI MUSHKILO'N ME'N HO MAAZI PALAT KE HAM KO PUKAARE KUCHH IS TARAH
तुग़ियानिय…

नज़्म - ख़िताब

ऐ मुसलमानो, है तुम से दस्त बस्ता ये ख़िताब दिल पे रख कर हाथ सोचो, फिर मुझे देना जवाब उम्मत ए मुस्लिम की हालत क्यूँ हुई इतनी ख़राब किस लिए अल्लाह ने डाला है हम पर ये अज़ाब
कह रहे हैं लोग, बदतर है हमारी ज़िन्दगी पिछड़ी कौमों से भी, बदबख्तों से भी, दलितों से भी सुन के ये सब मन्तकें, इक बात ये दिल में उठी हम में ये बे चेहरगी आख़िर कहाँ से आ गई
हम दलीतों से भी नीचे? अल्लाह अल्लाह, ख़ैर हो हाय ये हालत, कि हम से किबरिया का बैर हो? तुम वतन में रह के भी अपने वतन से ग़ैर हो अब क़दम कोई, कि अपनी भी तबीअत सैर हो
कुछ तो सोचो, ज़हन पे अपने भी कुछ तो ज़ोर दो ग़ैर के हाथों में आख़िर क्यूँ तुम अपनी डोर दो अपनी इस तीर शबी को फिर सुनहरी भोर दो फिर उठो इक बार ऐसे, वक़्त को झकझोर दो
ये ज़रा सोचो, कि तुम अपनी जड़ों से क्यूँ कटे मसलकों में क्यूँ जुदा हो, क्यूँ हो फ़िर्क़ों में बँटे अब तअस्सुब को समेटो, कुछ तो ये दूरी पटे यक जहत हो जाएं जो हम, तो ये तारीकी हटे
हम फ़रेब ए मसलेहत हर बार खाते आए हैं मुल्क के ये रहनुमा हम को नचाते आए हैं कितने अंदेशों से ये हम को डराते आए हैं ये हमारी लाश पर महफ़िल सजाते आए हैं
कौम के वो रहनुमा, जो बेच बैठे…