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Showing posts from July 22, 2018

कोई ख़ुशी भी मिली तो अज़ाब की सूरत

कोई ख़ुशी भी मिली तो अज़ाब की सूरत तमन्ना छलती है मुझ को सराब की सूरत
है अब भी क़ैद निगाहों में ख़्वाब की सूरत “खिला खिला सा वो चेहरा गुलाब की सूरत”
हज़ार शोरिशें लाया वो ज़ख़्म दे के गया मेरी हयात से गुज़रा शबाब की सूरत
करे वो प्यार तो एहसान की तरह अक्सर है इल्तेफ़ात भी उस का इताब की सूरत
हमारे जुर्म और अपनी अताएँ गिनता है वो कर रहा है शिकायत हिसाब की सूरत
लिखी हुई है कहानी तमाम हर्फ़ ब हर्फ़ फसाना कह गई सारा जनाब की सूरत
खुला किया है वो “मुमताज़” हम पे पै दर पै पढ़ा किए हैं उसे हम किताब की सूरत

बहार फिर से ख़िज़ाओं में आज ढलने लगी

बहारफिरसेख़िज़ाओंमेंआजढलनेलगी अभीखिलेभीनथेगुल, किरुतबदलनेलगी
येरतजगोंकासफ़रऔरकबतलकआख़िर किअबतोशबकीसियाहीभीआँखमलनेलगी

न कोई दवा न इलाज है, ये मरज़ वो कैसा लगा गया

नकोईदवानइलाजहै, येमरज़वोकैसालगागया मेरीसाँससाँसबिखरगई, मेरीज़िन्दगीसेवोक्यागया
ज़राबुझचलीथीयेआगअभी, वोहवाएँदेकेजलागया दिलएग़मज़दाकोउम्मीद