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ता उम्र ज़िन्दगी की रिफ़ाक़त मिली नहीं

ता उम्र ज़िन्दगी की रिफ़ाक़त मिली नहीं हम को मोहब्बतों की विरासत मिली नहीं
बचपन तमाम सोच के जंगल में खो गया माँ का दुलार, बाप की शफ़क़त मिली नहीं
मसरूफ़ियत की धुंध में इख़लास खो गया हम को तमाम उम्र ये राहत मिली नहीं
हम सारी उम्र ग़म की फ़स्ल काटते रहे मेहनत बहुत कड़ी थी प उजरत मिली नहीं
जीने की कश्मकश में कहाँ ज़िन्दगी गई ये सोचने की भी हमें फ़ुरसत मिली नहीं
जो राह सामने थी वो आगे से बंद थी और वापसी की कोई भी सूरत मिली नहीं
सहरा की वुसअतों में तअक़्क़ुब सराब का इस कश्मकश में जीने की फ़ुरसत मिली नहीं
ताउम्र बेक़रार थे जिस की तलाश में मर कर भी वो सूकून की लज़्ज़त मिली नहीं
जीने की आरज़ू भी ना जाने कहाँ गई और ज़िन्दगी से भी हमें रुख़सत मिली नहीं
तनहाई में “मुमताज़” करें जिस पे नाज़ हम
ऐसी हयात में कोई साअत मिली नहीं 

देख के हम को कतरा जाना दुनिया का दस्तूर हुआ - एक बहुत पुरानी ग़ज़ल

देख के हम को कतरा जाना दुनिया का दस्तूर हुआ हम ना जिसे गिनती में लाए वो भी अब मग़रूर हुआ
हम ने तो महफ़ूज़ बहुत रक्खा था अना के शीशे को आईना नाज़ुक था ज़रा सी ठेस लगी और चूर हुआ
दस्त दराज़ी सब के आगे थी हमको मंज़ूर कहाँ हम कितने लाचार हुए ये दिल कितना मजबूर हुआ
इस जंगल की वुसअत में हम चलते चलते हार गए राह कुशादा है अब भी सारा तन थक कर चूर हुआ
किस ने इस वीराने में ये दीप जला कर छोड़ा था तेज़ हवा से लड़ता कब तक आख़िर वो बेनूर हुआ
यूँ तो बहुत सी चोटें खाईं सारा तन ही ज़ख़्मी था
ज़ख़्म वो जो “मुमताज़” था दिल पर वो तो अब नासूर हुआ 

दीवाना बना दे

जुनून ऐसा कि हस्ती कमाल हो जाए हर एक साँस मेरी इक सवाल हो जाए बेख़ुदी की ये तलब हो हिज्र में जाँ ब लब हो ऐसा दीवाना बना दे मुझे अफ़साना बना दे
तेरी तलब से परे तेरी राह से आगे तलाश मैं ने किया मेहर-ओ-माह से आगे कहाँ कहाँ ना मेरी बेख़ुदी पुकार आई कोई मिला ना तेरी जल्वागाह से आगे ना ख़बर है ना पता है तू सनम है कि ख़ुदा है मुन्कशिफ़ कर दे हक़ीक़त मुझे फ़रज़ाना बना दे
जुनून रक़्स करे ऐसा वज्द तारी हो सूकून जिसमें रहे ऐसी बेक़रारी हो तड़पते दिल पे मोहब्बत की ग़मगुसारी हो जमाल-ए-यार की ज़ौ पर निगाह वारी हो जल्वा जब ऐसा ग़ज़ब हो फिर कहाँ पास-ए-अदब हो नश्शा छाने दे बला का जज़्बा रिन्दाना बना दे
ये किस मक़ाम पे लाई है आशिक़ी मुझ को कि नूर बन के मिली दिल की तीरगी मुझ को बलन्दियों का मुझे ऐसा इश्तियाक़ हुआ कि रास आ गई तूफ़ाँ की रहबरी मुझको दिल में इक शमअ जली है इक तजल्ली सी खिली है चमक उट्ठे ये ज़माना
नूर-ए-मस्ताना बना दे 

उस ने जब मुझ को मेरे जज़्बात वापस कर दिए

उस ने जब मुझ को मेरे जज़्बात वापस कर दिए क्यूँ बताऊँ मैं, कि मैं हूँ ग़मज़दा उस के लिए
क्या कहा? इन हसरतों से आप का जी भर गया हम भी अब इस खेल से तंग आ चुके हैं, जाइए
जाने कितनी धज्जियों में इस दफ़ा बिखरे हैं हम दिल, जिगर, दामन, गरेबाँ, अब कोई क्या क्या सिये
इश्क की ये आज़माइश आप के बस की नहीं क़त्ल होने के लिए भी तो कलेजा चाहिए
तोड़ ही डाला न आख़िर ये खिलौना आप ने खेलने के वास्ते अब दूसरा दिल लाइए
इस कहानी में नया पैवंद किस सूरत लगे जाने कब के भर चुके हैं ज़िन्दगी के हाशिये
नफ़रतों की इन्तहा से इश्क़ के बहलाव तक आरज़ू के कैसे कैसे इम्तेहाँ उस ने लिए
कुछ ख़बर "मुमताज़" तो हो कब तलक बर आएगी एक हसरत के लिए आख़िर कोई कब तक जिए

जज़्बात- भावनाएं, ग़मज़दा- दुखी, हसरतों से- इच्छाओं से, बर आएगी- पूरी होगी 

गीत - जोगन

हुई दीवानी जोगन प्रेमरस भीगा जीवन प्रेमरस भीगी लगन डोले मगन भीगा है मन रे नाम पिया का बोले धड़कन रे
इश्क़ की ताल पे जज़्बात के झूमे तराने झूम कर गाए पायल गूँज उठें मुरली की ताने झननन नाचे जोगन अपनी सुध बुध से अनजानी ऐसी बदनाम हुई अपने प्रीतम की दीवानी बढ़ी जब दिल की तपन प्रेम में डूबा जीवन प्रीत कब ऐसी पले रीत कहाँ ऐसी चले रे पी जाए विष का प्याला जोगन रे
दिल में अनोखी टीस उठी इक दर्द उठा अंजाना अब तो पराया हो बैठा है हर जाना पहचाना हर मस्ती में एक तलातुम, जज़्बों में मैख़ाना ऐसा उठा जज़्बात का तूफ़ाँ डूबा दिल दीवाना इश्क़ ने पहना जुनूँ बेकली में है सुकूँ जोश में आया है ख़ूँ छाया फ़ुसूँ दिल है निगूँ रे जज़्बों का मतवाला नर्तन रे
आँखें प्यासी, लब हैं तशना, दिल महबूब का ख़्वाहाँ मुश्किल टेढ़ी मेढ़ी राहें इश्क़ नहीं है आसाँ तोड़ दे हर ज़ंजीर गिरा दे अब दीवार-ए-ज़िन्दाँ जाग उठा हर दर्द पुराना जाग उठा हर अरमाँ
धो दिया था वक़्त ने जो वो निशाँ फिर जाग उठा बेकस-ओ-बेबस वो जज़्बा नातवाँ फिर जाग उठा दिल से इक आवाज़ उट्ठी सोज़-ए-जाँ फिर जाग उठा आरज़ूओं का वो बहर-ए-बेकराँ फिर जाग उठा नैन दीवाने हुए रंग बेगाने हुए ख़ाक परवाने हुए उफ़…

मैं कि शायर हूँ, है अंदाज़ निराला मेरा

बिखरा करता है हर इक दिल में उजाला मेरा मैं कि शायर हूँ, है अंदाज़ निराला मेरा
राह कोई न मिली उसको मेरी जानिब की कितना मजबूर हुआ चाहने वाला मेरा
दर्द अब हद से सिवा होने लगा है दिल में अब तो रह रह के तपक जाता है छाला मेरा
बेनियाज़ी पे असर कोई तो होगा उसकी अर्श को जा के हिला आया है नाला मेरा
रूह प्यासी है, जिगर ज़ख़्मी है, दिल बोसीदा अक्स क़िस्मत ने भी क्या ख़ूब है ढाला मेरा
ऐसी नाख़्वांदा इबारत थी, पढ़ा कुछ न गया जब नजूमी ने कभी फ़ाल निकाला मेरा
नज़्र क्या क्या ना किए रंज-ओ-ग़म-ओ-महरूमी उस ने “मुमताज़” कहा कोई ना टाला मेरा

जानिब – तरफ़, तपक – टीस, बेनियाज़ी – बेपरवाई (अल्लाह की एक ख़ासियत), अर्श – सातवाँ आसमान, बोसीदा – टूटने फूटने के क़रीब, नाख़्वांदा – अपठनीय, नजूमी – ज्योतिषी, फ़ाल – भविष्यफल, नज़्र – तोहफ़ा