मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा




मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा
सर्द सा इक रंग फैला जा ब जा रह जाएगा

कर तो लूँ तर्क-ए-मोहब्बत लेकिन उस के बाद भी
कुछ अधूरी ख़्वाहिशों का सिलसिला रह जाएगा

कारवाँ तो खो भी जाएगा ग़ुबार-ए-राह में
दूर तक फैला हुआ इक रास्ता रह जाएगा

टूट जाएँगी उम्मीदें, पस्त होंगे हौसले
एक तन्हा आदमी बे दस्त-ओ-पा रह जाएगा

मैं अगर अपनी ख़मोशी को अता कर दूँ ज़ुबाँ
हैरतों के दायरों में तू घिरा रह जाएगा

अपना सब कुछ खो के पाया है तुझे मुमताज़ ने
खो गया तू भी तो मेरे पास क्या रह जाएगा

Comments

Popular posts from this blog

फ़र्श था मख़मल का, लेकिन तीलियाँ फ़ौलाद की

ज़ालिम के दिल को भी शाद नहीं करते

सांस्कृतिक प्रदूषण