ग़ज़ल - लम्हा लम्हा ज़िन्दगी का

मेरी ये ग़ज़ल उर्दू मैगज़ीन "इंशा" में छप कर मक़बूल हो चुकी है। ये ग़ज़ल आप लोगों के लिए पेश-ए-ख़िदमत है

लम्हा लम्हा ज़िन्दगी का इक सज़ा होने लगा
अब तो हर इक दर्द-ए-पैहम लादवा होने लगा
LAMHA LAMHA ZINDAGI KA IK SAZAA HONE LAGA
AB TO HAR  IK DARD E PAIHAM LADAVAA HONE LAGA

रास्ते की जुस्तजू जब की तो मंज़िल मिल गई
मंज़िलें ढूँढ़ीं तो रस्ता नारसा होने लगा
RAASTE KI JUSTJU JAB KI TO MANZIL MIL GAI
MANZILEN DHOONDIN TO RASTAA NARASAA HONE LAGA

ऐ मोहब्बत तेरे इस एहसान का बस शुक्रिया
अब तो तेरे नाम से भी ख़ौफ़ सा होने लगा
AEY MOHABBAT TERE IS EHSAAN KA BAS SHUKRIYA
AB TO TERE NAAM SE BHI KHAUF SA HONE LAGA

करवटें लेता है दिल में फिर से इक तूफ़ान सा
हम अभी मुश्किल से संभले थे, ये क्या होने लगा
KARWATEN LETA HAI DIL MEN PHIR SE IK TOOFAAN SA
HAM ABHI MUSHKIL SE SAMBHLE THE YE KYA HONE LAGA

ये रबाब-ए-दिल तो इक मुद्दत हुई, ख़ामोश है
क्यूँ ये साज़-ए-बेसदा नग़्मासरा होने लगा
YE RABAAB E DIL TO IK MUDDAT HUI KHAAMOSH HAI
KYUN YE SAAZ E BESADAA NAGHMA SARAA HONE LAGA

एक हल्का सा तबस्सुम लब पे आया था कि बस
दर्द-ओ-ग़म में बाहमी कुछ मशवरा होने लगा
EK HALKA SA TABASSUM LAB PE AAYA THA KE BAS
DARD O GHAM MEN BAAHAMI KUCHH MASHWIRA HONE LAGA

हर क़दम इक सानेहा, हर लहज़ा कोई हादसा
इब्तेदा में इंतेहा का तजरुबा होने लगा
HAR QADAM IK SAANEHA HAR LEHZA KOI HAADSA
IBTEDA MEN INTEHA KA TAJRUBAA HONE LAGA

जी में आता है कि मिलने की कोई सूरत बने
भर चुका था ज़ख़्म जो, फिर से हरा होने लगा
JEE MEN AATA HAI KE MILNE KI KOI SOORAT BANE
BHAR CHUKA THA ZAKHM JO PHIR SE HARA HONE LAGA

आज जब उससे मिले, वो कितना बेगाना लगा
उससे क्यूँ मुमताज़ दिल बेवास्ता होने लगा
AAJ JAB US SE MILE WO KITNA BEGAANA LAGA

US SE KYUN 'MUMTAZ' DIL BEWAASTA HONE LAGA


लम्हा लम्हा पल पलदर्द-ए-पैहम लगातार होने वाला दर्द, लादवा जिसकी दवा न हो, जुस्तजू तलाश, नारसा न पहुँचने वाला, रबाब एक साज़ का नाम, साज़-ए-बेसदा बिना आवाज़ का साज़, नग़्मासरा गीत गाने वाला, तबस्सुम मुस्कुराहट, दर्द-ओ-ग़म दर्द और दुख, बाहमी आपस में, सानेहा घटना, लहज़ा पल,  हादसा दुर्घटना, इब्तेदा शुरुआत, इंतेहा अंत

टिप्पणियाँ

  1. Ek halka sa tabassum lab pe aaya tha ke bas, Dard o gham mein baahami kuch mashwira hone laga. Behad achhi ghazal hai, har sher achha hai, Is sher par Khumaar sahab ki ghazal ka ek sher yaad aa gaya: Main hasne ko hans loon magar Doston, Agar aasuon ko pata ho gaya !

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हर तरफ़ वीरानियाँ, हर तरफ़ तारीक रात

ग़ज़ल - करो कुछ तो हँसने हँसाने की बातें

ग़ज़ल - जब निगाहों में कोई मंज़र पुराना आ गया