चलन ज़माने के ऐ यार इख़्तियार न कर

चलन ज़माने के ऐ यार इख़्तियार न कर
ख़ुशी के साथ मेरी वहशतें शुमार न कर

तेरी हयात का गुज़रा वो एक लम्हा है
वो अब न आएगा, अब उसका इंतज़ार न कर

तिजारतों में दिलों की सुना नहीं करते
दिलों की बात पे इतना भी ऐतबार न कर

हुआ तमाम वो क़िस्सा, कि बात ख़त्म हुई
ज़रा सी बात पे आँखों को अश्कबार न कर

मिलेगी कोई न क़ीमत मचलते जज़्बों की
तू अपनी रूह के ज़ख़्मों का कारोबार न कर

निदामतों के सिवा क्या तुझे मिलेगा यहाँ
सवाल कर के तअल्लुक़ को शर्मसार न कर

है इब्तेदा ही अभी मुश्किलों की, हार न मान
अभी ग़मों को तबीयत पे आशकार न कर

हिसार-ए-ज़ात को महदूद कर न इतना भी
ये भूल जान के मुमताज़ बार बार न कर


शुमार गिनती, हयात ज़िन्दगी, तिजारतों में व्यापार में, अश्कबार आंसुओं से भरी हुई, निदामत शर्मिंदगी, आशकार ज़ाहिर, हिसार-ए-ज़ात व्यक्तित्व का घेरा, महदूद सीमित 

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