ज़रा ज़रा सा मज़ा भी है दिल के क़ीने में

ज़रा ज़रा सा मज़ा भी है दिल के क़ीने में
ये मीठी मीठी ख़लिश क्यूँ है आज सीने में

नसीब में था लिखा डूबना, सो यूँ भी हुआ
सुराख़ हो गया पतवार से सफ़ीने में

छुपा के ज़ख्मों को रखना तो हम ने सीख लिया
महक लहू की घुली रह गई पसीने में

है बेशक़ीमती दौलत, मगर है जाँलेवा
पले हैं नाग मोहब्बत के इस ख़ज़ीने में

शराब से भी ज़ियादा ख़ुमार है इन में
मज़ा अजीब सा आता है अश्क पीने में

क़ुसूर क्या था मेरा, क्यूँ हयात रूठ गई
कमी तो कोई कभी की न हम ने जीने में

चमक तो ऐसी, कि आँखों में चुभ रही है, मगर
ज़रा सा खोट भी है दिल के इस नगीने में

जो मुनकशिफ़ हो तो हस्ती को ज़ेर ओ बम कर दे
वो राज़ दफ़्न है "मुमताज़" इस दफ़ीने में


क़ीने में-फ़साद में, ख़लिश-चुभन, सफ़ीने में-नाव में, ख़ुमार-नशा, अश्क-आंसू, हयात-जीवन, मुन्कशिफ-ज़ाहिर, ज़ेर ओ बम-तहस नहस, दफीने में-दबे हुए खज़ाने में 

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