माह-ए-कामिल डूब गया

ख़्वाब नगर के दरियाओं में माह-ए-कामिल डूब गया
जानम तेरी झील सी गहरी आँखों में दिल डूब गया
khwaab nagar ke dariyaaoN meN maah e kaamil doob gaya
jaanam teri jheel si gehri aankhoN meN dil doob gaya

मेरे लहू के दरिया में पहले तो बातिल डूब गया
वहशत की गहराई में फिर मेरा क़ातिल डूब गया
mere lahoo ke dariya meN pehle to baatil doob gaya
wahshat ki gehraai meN phir mera qaatil doob gaya

कुछ ऐसी तुग़ियानी थी अपने जज़्बात की मौजों में
आँखों की कश्ती में बैठा था फिर भी दिल डूब गया
kuchh aisi tughyaani thi apne jazbaat ki maujoN meN
aankhoN ki kashti meN baitha tha, phir bhi dil doob gaya

साहिल भी था सामने और लहरों में भी वो जोश न था
पार उतरना आसाँ था पर दिल था ग़ाफ़िल, डूब गया
saahil bhi tha saamne, aur lehroN meN bhi wo josh na tha
paar utarna aasaaN tha, par dil tha ghaafil, doob gaya

कश्ती तो कमज़ोर है लेकिन सोचो तो, जाएंगे कहाँ
हैरत की है बात मगर वो देखो, साहिल डूब गया
kashti to kamzor hai lekin socho to, jaaenge kahan
hairat ki hai baat, magar wo dekho, saahil doob gaya

साँसों की ठंडक से कोई चोट पुरानी फिर उभरी
सीने में सैलाब उठा तो आँखों का तिल डूब गया
saanson ki thandak se koi chot puraani phir ubhri
seene meN sailaab utha to aankhoN ka til doob gaya

ज़ब्त-ए-जुनूँ में ऐसी तपिश थी, आहों से आहन पिघला
ज़िंदानों में चर्चा हैं, लो, ज़ोम-ए-सलासिल टूट गया
zabt-e-junooN meN aisi tapish thi, aahoN se aahan pighla
zindaanoN meN charcha hai, lo, zo’m-e-salaasil toot gaya

ज़ुल्म का भर आया जो घड़ा तो एक करामत ये भी हुई
मेरा लहू क्या उबला, मेरा मद्द-ए-मुक़ाबिल डूब गया
zulm ka bhar aaya jo ghada to ek karaamat ye bhi hui
mera lahoo kya ubla mera madd-e-muqaabil doob gaya

कुछ तो थकन थी और रगों में जोश भी अबके कुछ कम था
और जुनूँ का अबके इरादा था भी मुश्किल, डूब गया
kuchh to thakan thi aur ragoN meN josh bhi abke kuchh kam tha
aur junooN ka abke iraada tha bhi mushkil, doob gaya

किस से गिला मुमताज़ करें हम अब अपनी महरूमी का
क़िस्मत की मौजों में मेरी ज़ीस्त का हासिल डूब गया
kis se gilaa 'Mumtaz' kareN ham ab apni mehroomi ka
qismat ki maujoN meN meri zeest ka haasil doob gaya
माह-ए-कामिल पूरा चाँद, बातिल झूठ, तुग़ियानी उतार चढ़ाव, मौजों में लहरों में,  ग़ाफ़िल असावधान, ज़ब्त-ए-जुनूँ जुनून को ज़ब्त करना, आहन लोहा, ज़िंदानों में क़ैदख़ानों में, ज़ोम-ए-सलासिल ज़ंजीरों का घमंड, करामत चमत्कार, मद्द-ए-मुक़ाबिल प्रतिद्वंदी, महरूमी कमी, ज़ीस्त का हासिल ज़िन्दगी की कमाई

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