तरही ग़ज़ल - कहाँ तक न जाने मैं आ गई

कहाँ तक न जाने मैं आ गई गुम रात दिन के शुमार में
कहीं क़ाफ़िला भी वो खो गया इन्हीं गर्दिशों के ग़ुबार में
KAHA'N TAK NA JAANE MAI'N AA GAI, GUM RAAT DIN KE SHUMAAR ME'N
KAHI'N QAAFILAA BHI WO KHO GAYA, INHI'N GARDISHO'N KE GHUBAAR ME'N

न कोई रफ़ीक़, न आशना, न अदू, न कोई रक़ीब है
मैं हूँ कब से तन्हा खड़ी हुई इस अना के तंग हिसार में
NA KOI RAFEEQ NA AASHNA, NA ADOO NA KOI RAQEEB HAI
MAI'N HOO'N KAB SE TANHAA KHADI HUI, IS ANAA KE TANG HISAAR ME'N

है अजीब फ़ितरत-ए-बेकराँ कि सुकूँ का कोई नहीं निशाँ
कभी शादमाँ हूँ गिरफ़्त में कभी मुंतशिर हूँ फ़रार में
HAI AJEEB FITRAT E BEKARAA'N KE SUKO'N KA KOI NISHAA'N NAHI'N
KABHI SHAADNAA'N HOO'N GIRAFT ME'N, KABHI MUNTASHIR HOO'N FARAAR ME'N

वो शब-ए-सियाह गुज़र गई मेरी ज़िन्दगी तो ठहर गई
है अजीब सी कोई बेकली कोई कश्मकश है क़रार में
WO SHAB E SIYAAH GUZAR GAI, MERI ZINDAGI TO THEHER GAI
HAI AJEEB SI KOI BEKALI, KOI KASH MA KASH HAI QARAAR ME'N

खिले गुल ही गुल हैं हर एक सिम्त हद्द-ए-निगाह तलक मगर
हैं चमन चमन पे उदासियाँ हैं ख़िज़ाँ के रंग बहार में
HAR SIMT GO GUL KHIL GAEY HADD E NIGAAH TALAK MAGAR
HAI'N CHAMAN CHAMAN PE UDAASIYAA'N, HAI'N KHIZAA'N KE RANG BAHAAR ME'N

जले पर भी वक़्त की धूप में गिरे हम ज़मीं पे हज़ारहा
वही हौसले हैं उड़ान में वही लग़्ज़िशें हैं शआर में
JALE PAR BHI WAQT KI DHOOP ME'N, GIRE HAM ZAMEE'N PE HAZAARHAA
WAHI HAUSLE HAI'N UDAAN ME'N, WAHI LAGHZISHE'N HAI'N SHA'AAR ME'N

जुदा हो गया है वरक़ वरक़ मेरी ज़िन्दगी की किताब का
वो ख़ज़ाना दिल का गँवा दिया थी मैं चूर कैसे ख़ुमार में
JUDAA HO GAYA HAI WARAQ WARAQ, MERI ZINDAGI KI KITAAB KA
WO KHAZAANA DIL KA GANWAA DIYA, RAHI CHOOR MAI'N JO KHUMAAR ME'N

न वो हिस रही न नज़ाकतें, न रहीं क़रार की हाजतें
न वो दिल में बाक़ी कसक रही न वो दर्द रूह-ए-फ़िगार में
NA WO HIS RAHI NA NAZAAKATE'N, NA RAHI'N QARAAR KI HAAJATE'N
NA WO DIL ME'N BAAQI KASAK RAHI, NA WO DARD ROOH E FIGAAR ME'N

मैं थी गुम सफ़र के जुनून में कि न देखे ख़ार भी राह के
मुमताज़ दिल था लहू लहू किसी आरज़ू के फ़िशार में
MAI'N THI GUM SAFAR KE JUNOON ME'N, KE NA DEKHE KHAAR BHI RAAH KE
'MUMTAZ' DIL THA LAHOO LAHOO KISI AARZOO KE FISHAAR ME'N


शुमार गिनती, रफ़ीक़ साथी, आशना पहचान वाला, अदू दुश्मन, रक़ीब प्रतिद्वंदी, हिसार घेरा,  बेकराँ अथाह, शादमाँ ख़ुश, गिरफ़्त बंधन, मुंतशिर बिखरा हुआ, फ़रार भागना, लग़्ज़िशें लड़खड़ाहट, शआर चलन, हिस महसूस करने की क्षमता, हाजतें ज़रूरतें, फ़िगार घायल, फ़िशार घुट जाना 

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