ग़ज़ल - हर हरकत में लाखों तूफ़ाँ, हर जुम्बिश में इक हंगाम

हर हरकत में लाखों तूफ़ाँ, हर जुम्बिश में इक हंगाम
मेरे इस बेख़ौफ़ जुनूँ का जाने क्या होगा अंजाम
har harkat meN laakhoN toofaaN har jumbish meN ik hangaam
mere is bekhauf junooN ka jaane kya hoga anjaam

दरियादिली का इस दुनिया में मिलता है ये ही इनआम
आग लगा दी छाँव को इस ने, धूप के सर पर है इल्ज़ाम
dariya dili ka is aalam meN milta hai ye hi in'aam
aag laga di chaanv ko is ne dhoop ke sar pe hai ilzaam

दिल में ख़ज़ाने, आँख में मोती, लेकिन दामन फिर भी तही
बस इतनी क़िस्मत है अपनी, ख़ाली मीना, ख़ाली जाम
dil meN khazaane aankh men moti, lekin daaman phir bhi tahee
bas itni qismat hai apni, khaali meena, khaali jaam

कुछ अपनी रफ़्तार बढ़ाओ, जोश को कुछ तुग़ियानी दो
मंज़िल कितनी दूर अभी है और घिरी आती है शाम
kuchh apni raftaar badhaao, josh ko kuchh tughyaani do
manzil kitni door abhi hai aur ghiri aati hai shaam

सारी उम्र की कीमत पर भी क़र्ज़ न उतरा रिश्तों का
बेचैनी, ज़िल्लत, रुसवाई, हम को मिला है ये इनआम
saari umr ki qeemat par bhi qarz na utra rishtoN ka
bechaini, zillat, ruswaai, ham ko mila hai ye in'aam

सारी लकीरें हम ने बनाईं ख़ुद अपने इन हाथों की
ये तो थी तदबीर हमारी, मुफ़्त हुई क़िस्मत बदनाम
saari lakeereN ham ne banaaiN khud apne in haathoN ki
ye to thi tadbeer hamaari, muft hui qismat badnaam

वक़्त ने इतने नक़्श बनाए चेहरा ही मेरा न रहा
पूछता है आईना मुझ से, कौन है तू, क्या तेरा नाम
waqt ne itne naqsh banaaey, chehra hi mera na raha
poochhta hai aainaa mujh se, kaun hai tu, kya tera naam

चाहा तो हमने कि मिटा दें माज़ी का हर एक निशाँ
सब तदबीरें ख़ाम हुईं हर कोशिश है मेरी नाकाम
chaaha to ham ne ke mitaa deN maazi ka har ek nishaaN
sab tadbeereN khaam huiN, har koshish hai meri naakaam

रात गए मुमताज़ ख़ुदा से बात हमारी होती है
रात की तारीकी में अक्सर हम पे उतरते हैं इल्हाम
raat gaey 'Mumtaz' khudaa se baat hamaari hoti hai
raat ki taareeki meN aksar ham par utre haiN ilhaam


मीना सुराही, तुग़ियानी उछाल, माज़ी अतीत, इल्हाम अलौकिक विचार 

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