नज़्म - ख़िताब

ऐ मुसलमानो, है तुम से दस्त बस्ता ये ख़िताब
दिल पे रख कर हाथ सोचो, फिर मुझे देना जवाब
उम्मत ए मुस्लिम की हालत क्यूँ हुई इतनी ख़राब
किस लिए अल्लाह ने डाला है हम पर ये अज़ाब

कह रहे हैं लोग, बदतर है हमारी ज़िन्दगी
पिछड़ी कौमों से भी, बदबख्तों से भी, दलितों से भी
सुन के ये सब मन्तकें, इक बात ये दिल में उठी
हम में ये बे चेहरगी आख़िर कहाँ से आ गई

हम दलीतों से भी नीचे? अल्लाह अल्लाह, ख़ैर हो
हाय ये हालत, कि हम से किबरिया का बैर हो?
तुम वतन में रह के भी अपने वतन से ग़ैर हो
अब क़दम कोई, कि अपनी भी तबीअत सैर हो

कुछ तो सोचो, ज़हन पे अपने भी कुछ तो ज़ोर दो
ग़ैर के हाथों में आख़िर क्यूँ तुम अपनी डोर दो
अपनी इस तीर शबी को फिर सुनहरी भोर दो
फिर उठो इक बार ऐसे, वक़्त को झकझोर दो

ये ज़रा सोचो, कि तुम अपनी जड़ों से क्यूँ कटे
मसलकों में क्यूँ जुदा हो, क्यूँ हो फ़िर्क़ों में बँटे
अब तअस्सुब को समेटो, कुछ तो ये दूरी पटे
यक जहत हो जाएं जो हम, तो ये तारीकी हटे

हम फ़रेब ए मसलेहत हर बार खाते आए हैं
मुल्क के ये रहनुमा हम को नचाते आए हैं
कितने अंदेशों से ये हम को डराते आए हैं
ये हमारी लाश पर महफ़िल सजाते आए हैं

कौम के वो रहनुमा, जो बेच बैठे हैं ज़मीर
ये तो ख़ुद अपनी ही फ़ितना साज़ियों के हैं अमीर
ये ग़ुलाम ए माल ओ ज़र, ये ऐश ओ इशरत के असीर
ख़ुद ही सोचो, क्या बनेंगे ये तुम्हारे दस्तगीर

हौसले तो कोई देखे ग़ैरत ए वजदान के
दो किताबें पढ़ के आलिम बन गए क़ुरआन के
नीम कि हिकमत करें जो, वो हैं गाहक जान के
बात इन की मानना, लेकिन ज़रा पहचान के

दीन के फ़ितना गरों को कोई समझाए ये राज़
मुफ़लिसी में टूट जाता है वज़अ दारी का साज़
जल रहा हो जब शिकम तो क्या हक़ीक़त, क्या मजाज़
पेट जब भूका हो तो फिर कैसा सजदा, क्या नमाज़

पेट में रोटी न हो तो इल्म सब बेकार है
दुनिया में हम हैं, तो दुनियादारी भी दरकार है
उस ने हम को दीन बख्शा, उस का है हम पर करम
पर उसी मालिक ने ही तो हम को बख्शा है शिकम

एक ने'मत पर फ़िदा हैं, एक से इनकार, क्यूँ
सो रहे हो किस लिए, होते नहीं बेदार क्यूँ
कुंद ज़हनों की तुम्हारे पद गई है धार क्यूँ
इल्म ओ फ़न पर आज आख़िर इतनी है तक़रार क्यूँ

कब कहा क़ुरआन ने, तू इल्म से ग़ाफिल रहो
है कहाँ लिखा, कि दुनिया से सदा बेदिल रहो
फ़ितना ये मिल्लत के ठेकेदारों का है ख़ामखाह
है कहाँ लिखा, कि अन्ग्रेज़ी का पढना है गुनाह

लीजिये, क़ुरआन पढ़िए, और हदीसें देखिये
मसअले पढ़िए, समझिये, सोचिये, फिर सोचिये
है ये फ़रमान ए पयम्बर, छान लीजे कायनात
इल्म की दरकार हो तो चीन तक भी जाइए

कैसे कैसे सर किये हैं ज़िन्दगी के मारके
साहिब ए किरदार हम ने कैसे कैसे हैं दिए
फ़लसफ़ा, साइंस, अलजबरा, रियाज़ी देखिये
और अब हम पढ़ रहे हैं ज़िन्दगी के मर्सिये

हैं कहाँ बू बक्र ओ उस्मान ओ अली के फ़लसफ़े
है कहाँ वो जोश, जज़्बात ए हुसैनी क्या हुए
सादी ओ रूमी, बनू मूसा, कहाँ सब खो गए
हौसले इतने हमारे पस्त कैसे हो गए

सैयद अहमद और उन के हौसलों का ज़िक्र हो
काश हम में बुल कलाम आज़ाद जैसी फ़िक्र हो
लाओ फिर इक़बाल को, फिर जोश इक पैदा करो
बेकराँ है फ़न तुम्हारे हाथ में कारीगरो

बाँध लो फिर से कमर, मिल कर सभी आगे बढ़ो
चाहे जैसे हो, ज़ियादा से ज़ियादा तुम पढ़ो
आओ पस्ती से निकल कर, फिर बलंदी पर चढ़ो
कामयाबी के, तरक्क़ी के नए पैकर गढ़ो

अपनी मंजिल एक है, अपना इरादा एक है
है अलालत एक अपनी, उस का चारा एक है
अपनी चाहत, अपनी मिल्लत, अपना रस्ता एक है
एक है क़ुरआन अपना, अपना काबा एक है

एक में सी डालो सब को, सारे परचम एक हों
सारे मसलक, सारे फ़िर्क़े मिल के बाहम एक हों
एक ताक़त बन के हम उभरें, अगर हम एक हों
आओ अपनी कौम की ख़ातिर सभी हम एक हों

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