ग़ज़ल - शब का इक एक पल पिघलता है

शब का इक एक पल पिघलता है
जब भी सूरज नया निकलता है
SHAB KA IK EK PAL PIGHALTA HAI
JAB BHI SOORAJ NAYA NIKALTA HAI

जब भी माज़ी का जायज़ा लीजे
ज़हन का कोना कोना जलता है
JAB BHI MAAZI KA JAAIZA LIJE
ZEHN KA KONA KONA JALTA HAI

मिलना अहबाब से तो दूर, अब तो
ज़िक्र भी दोस्तों का खलता है
MILNA EHBAAB SE TO DOOR, AB TO
ZIKR BHI DOSTON KA KHALTA HAI

अब करें क्या हयात की सूरत
ज़हन में इक सवाल उबलता है
AB KAREN KYA HAYAAT KI SOORAT
IK ZEHN MEN SAWAAL UBALTA HAI

वो मक़ाम आ गया जहाँ से अब
अपना हर रास्ता बदलता है
WO MAQAAM AA GAYA JAHAN SE AB
APNA HAR RAASTA BADALTA HAI

हर ख़ुशी, हर तमन्ना, हर जज़्बा
दिल को सूरत बदल के छलता है
HAR KHUSHI, HAR TAMANNA, HAR JAZBA
DIL KO SOORAT BADAL KE CHHALTA HAI

सिर्फ़ शमअ नहीं अब इस घर में
रात भर दिल भी साथ जलता है
IK SHAMA'A HI NAHIN AB IS GHAR MEN
RAAT BHAR DIL BHI SAATH JALTA HAI

बारहा टूट कर भी दिल वो है
फिर धड़कता है, फिर मचलता है
BAARHAA TOOT KAR BHI DIL WO HAI
PHIR DHADAKTA HAI, PHIR MACHALTA HAI

कोई एहसास, न अरमाँ, न उम्मीद
आज कल दिल में दर्द पलता है
KOI EHSAAS NA ARMAA'N NA UMMEED
AAJ KAL DIL ME'N DARD PALTA HAI

तपता सहरा है ज़िन्दगी मुमताज़
अपना साया भी अब तो जलता है
TAPTA SEHRA HAI ZINDAGI "MUMTAZ"
APNA SAYAA BHI AB TO JALTA HAI


माज़ी अतीत, ज़हन दिमाग़, अहबाब प्यारे लोग, हयात जीवन, बारहा बार बार, सहरा रेगिस्तान 

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