ग़ज़ल - कोई हिकमत न चली, कोई भी दरमाँ न चला

कोई हिकमत न चली, कोई भी दरमाँ न चला
पुर नहीं होता किसी तौर मेरे दिल का ख़ला
KOI HIKMAT NA CHALI KOI BHI DARMAA'N NA CHALA
PUR NAHIN HOTA KISI TAUR MERE DIL KA KHALAA

तो तमन्नाओं की क़ुर्बानी भी काम आ ही गई
सुर्ख़रू हो के चलो आज का सूरज भी ढला
TO TAMANNAO'N KI QURBAANI BHI KAAM AA HI GAI
SURKHROO HO KE CHALO AAJ KA SOORAJ BHI DHALAA

मुंतज़िर घड़ियों की राहें जो हुईं लामहदूद
लम्हा लम्हा था तवील इतना कि टाले न टला
MUNTAZIR GHADIYO'N KI RAAHE'N JO HUI'N LAAMEHDOOD
LAMHAA LAMHAA THA TAWEEL ITNA KE TAALE NA TALAA

आज भी हम ने तुझे याद किया है जानम
दिल के ज़ख़्मों पे नमक आज भी जी भर के मला
AAJ BHI HAM NE TUJHE YAAD KIYA HAI JAANAM
DIL KE ZAKHMO'N PE NAMAK AAJ BHI JEE BHAR KE MALAA

अब हुकूमत में अना की तो यही होना था
दिल को बहलाया बहुत, ख़ूब तमन्ना को छला
AB HUKOOMAT ME'N ANAA KI O YAHI HONA THA
DIL KO BEHLAAYA BAHOT, KHOOB TAMANNA KO CHHALAA

तश्नगी का ये सफ़र और कहाँ ले जाता
मुझ को ले आया सराबों में मेरा कर्ब-ओ-बला
TASHNAGI KA YE SAFAR AUR KAHA'N LE JAATA
MUJH KO LE AAYA SARAABO'N ME'N MERA KARB O BALAA

जब से बाज़ार ने जज़्बात पे डाली है गिरफ़्त
फिर ज़माने में मोहब्बत का ये सिक्का न चला
JAB SE BAAZAAR NE JAZBAAT PE DAALI HAI GIRAFT
PHIR ZAMAANE ME'N MOHABBAT KA YE SIKKA NA CHALAA

दिन तो मुमताज़ ख़यालों से था ख़ाली लेकिन
रात ख़ामोश हुई जब तो मेरा ज़ेहन जला
DIN TO 'MUMTAZ' KHAYAALO'N SE MUZIR THA LEKIN
RAAT KHAAMOSH HUI JAB, TO MERA ZEHN JALAA


हिकमत डाक्टरी, दरमाँ इलाज, पुर नहीं होता भरता नहीं, ख़ला खालीपन, सुर्ख़रू कामयाब,  मुंतज़िर इंतज़ार में, लामहदूद जिस की हद न हो, तवील लंबा, अना अहं, तश्नगी प्यास, सराब मृग मरीचिका, कर्ब-ओ-बला मुसीबत, गिरफ़्त पकड़ 

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