ज़ख़्म महरूमी का भरने से रहा


ज़ख़्म  महरूमी  का  भरने  से  रहा
"कर्ब  का  सूरज  बिखरने  से  रहा"

ज़ीस्त  ही  गुज़रे  तो  अब  गुज़रे  मियाँ
वो  हसीं  पल  तो  गुज़रने  से  रहा

खेलते  आए  हैं  हम  भी  जान  पर
मुश्किलों  से  दिल  तो  डरने  से  रहा

फ़ैसला  हम  ही  कोई  कर  लें  चलो
वो  तो  ये  एहसान  करने  से  रहा

पल  ख़ुशी  के  पर  लगा  कर  उड़  गए
वक़्त  ही  ठहरा, ठहरने  से  रहा

है  ग़नीमत  लम्हा  भर  की  भी  ख़ुशी
अब  मुक़द्दर  तो  सँवरने  से  रहा

जोश  की  गर्मी  से  पिघलेगा  क़फ़स
अब  जुनूँ  घुट  घुट  के  मरने  से  रहा

अब  ख़ता  "मुमताज़" उस  की  हो  तो  हो
उस  पे  दिल  इलज़ाम  धरने  से  रहा

कर्ब – दर्द, ज़ीस्त – ज़िन्दगी, क़फ़स – पिंजरा, जुनूँ – सनक


zakhm mahroomi ka bharne se raha
karb ka sooraj bikharne se raha

zeest hi guzre to ab guzre miyaaN
wo haseeN pal to guzarne se raha

khelte aaye haiN ham bhi jaan par
mushkiloN se dil to darne se raha

faisla ham hi koi kar leN chalo
wo to yah ehsaan karne se raha

pal khushi ke par laga kar ud gaye
waqt hi thahra, thaharne se raha

hai ghaneemat lamha bhar kee bhi khushi
ab muqaddar to sanwarne se raha

josh kee garmi se pighlega qafas
ab junooN ghut ghut ke marne se raha

ab khata "Mumtaz" us ki ho to ho
us pe dil ilzaam dharne se raha 

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