बाग़ी क़व्वाल - अज़ीज़ नाज़ाँ (क़िस्त 3)


अभी तक वो इस्माईल आज़ाद के साथ कोरस करते आए थे, लेकिन अब उन्हें अपनी पहचान चाहिए थी । इस के लिए उन्हों ने अपने एक दोस्त यूसुफ़ अंदाज़ के साथ मिल कर एक गेम प्लान बनाया । ये दोनों किसी भी बड़े क़व्वाल के प्रोग्राम में पहुँच जाते । वहाँ ये दोनों अलग हो जाते । अब यूसुफ़ अंदाज़ ऑर्गनाइज़र को ढूँढता, उस से मिलता, और बातों बातों में ही उसे बताता, "वो लड़का ( यानी अज़ीज़ ) बहुत अच्छा गाता है । आप एक बार उसे सुनिए, इन सब को भूल जाएंगे ।" इस बात से मुतास्सिर हो कर ऑर्गनाइज़र उन से एक दो कलाम सुनाने का इसरार करता । वो पहले झूठ मूठ कि ना नुकर करते, फिर तैयार हो जाते । एक दो कलाम पेश करते, जो रक़म मिलती उसे बटोरते और चलते बनते । उधर उन कि तूफ़ानी पर्फ़ार्मेन्स के बाद असल क़व्वाल का प्रोग्राम जाम न पाता । थोड़े दिनों में ये बात मशहूर हो गई कि अज़ीज़ क़व्वालों का प्रोग्राम ख़राब कर देता है । 
इधर उन्हों ने रिकॉर्डिंग के लिए जद्दो जहद शुरू कर दी थी । उस वक़्त कोलम्बिया के रेकॉर्ड्स चलन में थे । कोलम्बिया की मेन ब्रांच कोलकाता में थी, और यहाँ मुंबई में भी एक ब्रांच थी । मुंबई ब्रांच के कर्ता धर्ता क़ासिम साहब थे, जो कासू मामा के नाम से मशहूर थे । अज़ीज़ साहब ने जब उन से मुलाक़ात की तो उन्हों ने उन्हें ये कहते हुए रिजैक्ट कर दिया कि तुम्हारी आवाज़ नक्की ( nasal ) है । वो मायूस तो हुए, लेकिन हार मानना उन कि फितरत में नहीं था । यहाँ मुंबई में रिजैक्ट होने के बाद वो कोलकाता जा पहुंचे, वहाँ ऑडिशन दिया और पास हो गए । इस तरह उन कि पहली रिकॉर्डिंग मुंबई के बजाए कोलकाता में हुई । फिर तो एक के बाद एक उन के कई रेकॉर्ड्स बने, लेकिन मुंबई में जब भी उन की रिकॉर्डिंग होती थी, वो कासू मामा को रिकॉर्डिंग रूम से बाहर निकाल देते थे । 
उन की उम्र कोई 16 साल की थी । सांताक्रूज में उन का प्रोग्राम था । एक लड़की उन को बड़े ग़ौर से सुन रही थी । और शेर पसंद आने पर पैसे भी देती थी । उस दिन वहाँ पैसों का ही नहीं, कोई और लेन देन भी हुआ । वो दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे थे । कुछ दिन उन दोनों के बीच रोमैन्स चला, फिर एक दिन उन दोनों ने शादी का फैसला कर लिया । लड़की क्रिश्चियन थी । घर वालों के मानने का तो सवाल ही नहीं था । लेकिन इश्क़ कब किसी की परवाह करता है । उन्हों ने अपने बहनोई को पटाया, उन की मदद से उस लड़की ने इस्लाम क़ुबूल किया और फिर उन्हों ने इन दोनों की शादी करा दी । शादी के बाद वो अपनी नई नवेली दुल्हन को ले कर घर पहुंचे । अब उन की माँ के पास उस को अपनाने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन उन की कभी भी उस से पटी नहीं । 
शादी के बाद ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं तो पैसे कमाने का दबाव भी बढ़ा । इस सिलसिले में उन्हें कई कई दिनों तक कभी नागपुर तो कभी कानपुर में रहना पड़ता था । उन्हीं दिनों की बात है, उन का एक रेकॉर्ड आया था, जिस में उन्हों ने फ़िल्म "नागिन" के गीत "मन डोले मेरा तन डोले " की धुन पर एक क़व्वाली "इल्लल्लाह हक़ इल्लल्लाह" गाई थी । जो उन की कव्वालियों की किताब में शामिल थी । उन्हीं दिनों उन का एक प्रोग्राम कानपुर के ग़म्मू ख़ाँ के अहाते में जानी बाबू के साथ रखा गया । यहाँ जानी बाबू ने एक चाल चली । पहला टर्न उस का था । उस ने ये क़व्वाली पेश कर दी । उस की इस चाल ने अज़ीज़ साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया । वो अपने साथ अपनी किताबें इस प्रोग्राम में बेचने और इस नाते कुछ एक्सट्रा पैसे कमाने की नीयत से ले गए थे । जब उन का टर्न आया तो ग़ुस्से में भरे अज़ीज़ नाज़ाँ ने स्टेज से ये एनॉउंस किया, "अभी अभी जो कलाम जानी साहब ने पेश किया, वो मेरा है, और ये रहा उस का सबूत । और उन्हों ने उस किताब की कापियाँ अवाम में उछाल दीं । फिर क्या था, उन का ये स्टंट काम कर गया और उन का ये प्रोग्राम सुपर हिट रहा । 
उन्हों ने सादिक़ निज़ामी की एक ग़ज़ल की धुन बनाई थी, जो बहुत पसंद की जाती थी, और जिस के बोल थे, "जो दहन से नाला निकल गया ।" 1961 में जब फ़िल्म "धर्म पुत्र" रिलीज़ हुई, तो उन को पता चला कि इस फ़िल्म कि एक क़व्वाली "जो ये दिल दीवान। मचल गया" में उन कि ये धुन उड़ा ली गई थी । फ़िल्म बी॰ आर ॰ चोपड़ा की थी और संगीतकार एन॰ दत्ता थे । वो बहुत मायूस हुए, तड़पे, छटपटाए, लेकिन कुछ न कर सके । बी॰ आर॰ चोपड़ा और एन॰ दत्ता बहोत बड़े लोग थे और अज़ीज़ साहब के पास इतना भी पैसा नहीं था कि एक वकील कर सकें । धुनें तो उन कि बाद में भी कई बार चोरी हुईं, लेकिन इस चोरी से उन को जो तकलीफ़ हुई थी, वो नाक़ाबिले-बर्दाश्त थी । 
इस के अगले साल सन 1962 में उन का रेकॉर्ड "जिया नहीं माना" आया, और बहुत हिट हुआ । यहाँ तक कि एच॰एम॰वी॰ के न्यूज़ लेटर में उन कि फोटो के साथ इस रेकॉर्ड का ज़िक्र था । ये उन कि पहली कामयाबी थी, जिस ने ऊनें एक पहचान दिलाई थी, और उन्हें बड़े क़व्वालों कि सफ़ में ला कर खड़ा कर दिया था । लेकिन उन कि मंज़िल अभी बहुत दूर थी । 
1967 का ज़माना था । नौशाद उस वक़्त फ़िल्म "पालकी" के संगीत पर काम कर रहे थे । एक ग़ज़ल कि धुन बन नहीं पा रही थी । ग़ज़ल के बोल थे, "ऐ शहरे-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है"। अज़ीज़ साहब के उस्ताद मोहम्मद इब्राहीम ख़ाँ साहब जो संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद (पाकीज़ा फ़ेम ) के छोटे भाई थे, नौशाद के एसिस्टेंट थे और अज़ीज़ साहब कि कई धुनें इस से पहले नौशाद साहब को दे चुके थे, जिस में "मेरे महबूब" के गीत "जानेमन इक नज़र देख ले" बतौर ए खास काबिले ज़िक्र है, क्यूँ के ये धुन हिट भी रही थी । एक दिन वो उन्हें नौशाद साहब के यहाँ ले गए । नौशाद ने उन्हें वही ग़ज़ल दी, और उस की धुन बनाने को कहा । उन्हों ने 15 मिनट में उस कि धुन तैयार कर दी, जो सब को बहुत पसंद आई । इस के बाद उन को नौशाद साहब ने बतौर एसिस्टेंट रख लिया । इस फ़िल्म में इस गीत के अलावा जो दूसरा गीत उन्हों ने तैयार किया वो था, "जाने वाले तेरा ख़ुदा हाफ़िज़" । इस के अलावा इस फ़िल्म में दरगाह के एक सीन में बैकग्राउंड में क़व्वाली सुनाई देती है, "न जाऊंगा कभी ख़ाली मेरे वारिस मेरे वाली" ये आवाज़ और धुन भी अज़ीज़ साहब कि ही थी । इसी साल उन्हों ने नौशाद के लिए फ़िल्म "राम और श्याम" में भी 3 धुनें बनाईं, जो थीं "बालम तेरे प्यार कि ठंडी आग में जलते जलते", "तू है साक़ी मैं हूँ शराबी शराबी" और "मैं ने कब तुम से कहा था कि मुझे प्यार करो"। 
1968 में उन्हों ने फ़िल्म "साथी" के लिए "मैं तो प्यार से तेरे पिया मांग सजाऊँगी" के अंतरे तैयार किए । जब कि दो गीतों "ये कौन आया रौशन हो गई" और "हुस्ने जानाँ इधर आ" कि पूरी धुनें उन्हीं की थीं । लेकिन अब नौशाद से उन के रिश्ते बिगड़ने लगे थे । वजह ये थी कि नौशाद उन को क्रेडिट नहीं देते थे । दूसरी बात, धुनें बनवाने के बाद जब वो गायकों के साथ उन कि रिहर्सल और रिकॉर्डिंग करते थे, तो उन्हें बाहर बिठाए रखते थेऔर इस बात का खास खयाल रखते थे कि उन कि किसी से मुलाक़ात न हो, जब कि अज़ीज़ साहब को ये शिकायत थी कि नौशाद धुन कि बारीकियाँ सिंगर पर ज़ाहिर नहीं कर पाते हैं । इसी साल "संघर्ष" आई, जिस के लिए उन्हों ने 3 गाने, "अगर ये हुस्न मेरा", "मेरे पास आओ नज़र तो मिलाओ" और "तस्वीरे-मोहब्बत थी जिस में" बनाए, जो बेहद हिट रहे । उन कि नाराजगी का नौशाद पर असर भी हुआ था, और संघर्ष कि कास्टिंग में उन का नाम नुमायाँ तौर पर दिया गया था, लेकिन "संघर्ष" के बाद वो नौशाद से अलग हो गए ।

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