बाग़ी क़व्वाल - अज़ीज़ नाज़ाँ (क़िस्त 1)


बेमिसाल शख़्सियत, नशे में डूबी आवाज़, लाजवाब अंदाज़ और बाग़ियाना तेवर, ग़ुस्सा ऐसा कि हमेशा नाक पर रखा रहे, अख़्लाक़ ऐसा कि दुश्मन भी मुरीद हो जाए और ख़ुलूस ऐसा कि बड़े बड़े इबादतगुज़ार सजदा रेज़ हो जाएँ । कुछ ऐसी ही magnetic शख़्सियत थी अज़ीज़ नाज़ाँ की ।
अज़ीज़ नाज़ाँ साहब मलबार (केरल) के एक सय्यद घराने से तअल्लुक़ रखते थे । उन के वालिद और वालिदा बड़े दीनदार, इबादत गुज़ार और परहेज़गार थे । एक भाई और तीन बहनें उन से बड़े थे और तीन भाई और एक बहन छोटे । उन का ख़ानदान काफी मोअज़्ज़िज़ माना जाता था । आज भी वो गली, जिस में उन का पुश्तैनी मकान है, उन के नाना मोहम्मद इब्राहीम सारंग के नाम से मंसूब है, और एम० ई० सारंग मार्ग के नाम से जानी जाती है । सुना तो ये भी है कि उन के ख़ानदान में उमर क़ाज़ी नाम के कोई वली भी हुए हैं, जिन का मज़ार आज भी केरल के शहर कालीकट में मौजूद है ।
अज़ीज़ नाज़ाँ अपनी तरह के अनोखे ही इंसान थे । बचपन में वो इतने शरीर थे कि उन की माँ को पल पल उन पर नज़र रखनी पड़ती थी । घर में मज़हबी माहौल होने के बावजूद उन को धार्मिक कर्म कांडों से कोई दिलचस्पी नहीं थी । शुरू में जुम्मा जुम्मा नमाज़ पढ़ भी लेते थे, लेकिन बाद में वो भी छोड़ दी । भूख उन को बर्दाश्त नहीं होती थी । घर वाले ज़बरदस्ती रोज़ा रखवा देते रोटी ले कर किसी कोने खांचे में छुप छुपा के खा लेते । जब पकड़े जाते तो पिटाई होती । लेकिन उन्हें न सुधरना था, न वो सुधरे ।
पतंग उड़ाने का उन्हें बहुत शौक़ था । ड्राइंग और पेंटिंग से गहरा लगाव था, और खुद भी बहुत अच्छी ड्राइंग कर लेते थे । पढ़ाई लिखाई से दूर भागते थे लेकिन खेल कूद में हमेशा आगे आगे रहते थे । इस के बावजूद अपनी पुर कशिश और सुरीली आवाज़ की बदौलत स्कूल में वो सब के चहीते थे ।
अभी उन की उम्र नौ साल की ही थी कि उन के वालिद ने इस दुनिया को ख़ैरबाद कह दिया । उन कि माँ अकेली रह गईं । ऊपर से नौ बच्चों कि परवरिश कि जिम्मेदारियाँ । ऐसे में अज़ीज़ साहब के चचा ने, जिन को वो चिच्चा कहते थे, अपना घर बार छोड़ दिया और यहाँ मुंबई में रह कर अपने भाई के कारोबार और बच्चों को संभालने का फ़ैसला कर लिया । उन के वालिद का जनरल स्टोर था । उसी से घर का ख़र्चा चलता था । लेकिन बाप के इंतक़ाल के बाद घर में तंगी रहने लगी । यहाँ तक कि अक्सर उन के कपड़ों में पैवंद लगे रहते । उन के नाना के यहाँ अथाह पैसा था । खाने को अच्छे से अच्छा मिलता था । ऐसे में खाने के शौक़ीन अज़ीज़ अक्सर नानी के घर चले जाते । हालाँकि उन कि ख़ुद्दार माँ ने उन्हें ये सीखा रखा था कि अगर नानी पूछें कि घर में क्या बना था तो कहना कि मुर्ग़ी का सालन । लेकिन इतना छोटा बच्चा अपने जज़्बात क्या छुपाता । उन कि ज़ुबान चाहे जो कहती, उन कि आँखें सारी सच्चाई बयान कर जातीं ।
संगीत से उन्हें लगाव तो जुनून की हद तक था ही । और फिर घर के ऐसे हालात । उन्हों ने उसी छोटी सी उम्र में ऑर्केस्ट्रा में गाना शुरू कर दिया । इस से उन का जेब ख़र्च निकलने लगा । वो लता मंगेशकर के बड़े फ़ैन थे । आवाज़ भी पतली थी । तो वो ऑर्केस्ट्रा में लता जी के गाने गाया करते थे ।
उस ज़माने में भेंडी बाज़ार अदब और मोसीक़ी का मरकज़ हुआ करता था । उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब का घर भी भेंडी बाज़ार में ही था । उन के यहाँ संगीत की महफ़िलें जमती थीं और बड़े बड़े संगीत के उस्ताद उन के यहाँ जलवा अफ़रोज़ होते थे । अज़ीज़ नाज़ाँ भी उन महफ़िलों में शामिल रहते । किसी उस्ताद के पाँव दबाते, किसी का सर । इस बहाने उन्हें संगीत सुनने और सीखने को मिलता । उस वक़्त उन महफ़िलों में उन के जो रिश्ते बने, वो मरते डैम तक क़ायम रहे । अल्लाह रक्खा ख़ाँ साहब, अमीर ख़ाँ साहब, फ़ैयाज़ ख़ाँ साहब, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब वग़ैरह जब तक ज़िंदा रहे, तब तक उन्हें बच्चे की तरह प्यार करते रहे । उन उस्तादों ने उन के अंदर छुपे कलाकार को पहचान लिया था । उन के बारे में उन सब की एक राय थी । अज़ीज़ संगीत की चोरी करता है । वो समझ गए थे के वो उन की ख़िदमत के बहाने संगीत सीखने के ख़्वाहाँ हैं । बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब उन से अक्सर करते, "अज़ीज़, गंडा बँधवा ले ।" वो सुनते, मुस्कराते, और टाल जाते । शायद बचपन की नादानी थी । लेकिन इस बात का अफ़सोस उन्हें ताउम्र रहा कि काश उन्होंने बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब की बात मान ली होती और उन से गंडा बँधवा लेते । लेकिन जब तक उन्हें ये अक़्ल आई, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब इस दुनिया ए फ़ानी को अलविदा कह चुके थे ।

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