हमसफ़र, हमराज़, हमसर, हमनवा कोई नहीं

हमसफ़र, हमराज़, हमसर, हमनवा कोई नहीं
खो चुके हैं हम यहाँ अपना पता कोई नहीं

वो हमारे हाल से रहते हैं अक्सर बेनियाज़
है सज़ा इतनी बड़ी लेकिन ख़ता कोई नहीं

जिसपे डाली इक नज़र, दुनिया से बेगाना हुआ
साहिरी से उन निगाहों की बचा कोई नहीं

बेख़ुदी है, मस्तियाँ हैं, है अजब दीवानगी
इश्क़ जैसा इस जहाँ में मैकदा कोई नहीं

एक अनसुलझा मोअम्मा ही रहा तेरा करम
उम्र भर की आज़माइश का सिला कोई नहीं

एक साया सा हमारे साथ रहता है सदा
ढूंढते फिरते हैं हम लेकिन मिला कोई नहीं

दश्त में, बस्ती में, हर महफ़िल में, हर तन्हाई में
तू ही तू है हर जगह, तेरे सिवा कोई नहीं

हम ने ख़ुद को खो के आख़िर आप को पा ही लिया
आपसे मुमताज़ हमको अब गिला कोई नहीं


 हमसफ़र सफ़र का साथी, हमराज़ राज़ में शामिल, हमसर साथी, हमनवा बातें करने वाला, बेगाना पराया, साहिरी जादूगरी, मोअम्मा पहेली 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हर तरफ़ वीरानियाँ, हर तरफ़ तारीक रात

ग़ज़ल - करो कुछ तो हँसने हँसाने की बातें

ग़ज़ल - जब निगाहों में कोई मंज़र पुराना आ गया