बुझी सी राख़ में किस शय की जुस्तजू है तुझे

बुझी सी राख़ में किस शय की जुस्तजू है तुझे
सियाह रात में सूरज की आरज़ू है तुझे

ये रेगज़ार जो ताहद्द-ए-नज़र फैला है
है हौसला तो ये सहरा भी आबजू है तुझे

ये रेगज़ार की वुसअत, ये हसरतों का सराब
ख़िज़ाँ में कैसी अजब ख़्वाहिश-ए-नमू है तुझे

भटकता फिरता है क्यूँ ऐ दिल-ए-आवारा सिफ़त
तलाश कौन सी शय की ये कू-ब-कू है तुझे

निकाल लेता है ख़ुशियों में भी अश्कों का जवाज़
अजब शआर है, ग़म की ये कैसी ख़ू है तुझे


ताहद्द-ए-नज़र नज़र की हद तक, आबजू नहर, वुसअत फैलाव, सराब मरीचिका, ख़िज़ाँ पतझड़, नमू फलने फूलने की क्षमता, आवारा सिफ़त आवारा मिजाज, कू-ब-कू गली गली, जवाज़ औचित्य, शआर आदत, ख़ू आदत 

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