तूल ये तन्हाइयों का, कितनी लम्बी है ये रात

तूल ये तन्हाइयों का, कितनी लम्बी है ये रात
इस अज़ाब ए ज़िन्दगी से क्यूँ नहीं मिलती निजात

कुर्बतों के दर्मियाँ थे कितने लम्बे फ़ासलात
दिल के टुकड़े कर गई है आज तेरी बात बात

हसरतों का बोझ, आँखों की जलन, ये रतजगे
वुसअतें तन्हाई की ये, एक भी साया, न ज़ात

सो गई हर एक हलचल, खो गई हर ज़िन्दगी
ख़ामुशी के शोर से अब गूंजते हैं जंगलात

रतजगे, बेचैनियाँ, उलझन, तवक़्क़ोअ, हैरतें
जिस में इतने पेच ओ ख़म हैं, है ये कैसा इल्तेफ़ात

अब कहाँ जाने रुके अल्फ़ाज़ का ये काफ़िला
ये जुनूँ की आज़माइश, ये सुख़न की वारदात

कैसी ने'मत पाई है अब के दिल ए मजरूह ने
मेरे दामन में सिमट आई है सारी कायनात

हम ने ये "मुमताज़" बाज़ी हार कर भी जीत ली
जान की बाज़ी में यारो, कैसी जीत और कैसी मात

तूल-लम्बाई, अज़ाब ए ज़िन्दगी-जीवन की यातना, निजात-छुटकारा, क़ुर्बतों के दर्मियाँ-नज़दीकियों में, फ़ासलात-दूरियां, वुसअतें-फैलाव, तवक्कोअ-उम्मीद, पेच ओ ख़म-मोड़ और घुमाव, इल्तेफात-मेहरबानी, अल्फ़ाज़-शब्द, जुनूँ-पागलपन, आज़माइश-परीक्षा, सुख़न-शायरी, मजरूह-घायल, कायनात-ब्रम्हांड  

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