चंद मुर्दा ख़्वाहिशों पर आज तक टाला मुझे


चंद मुर्दा ख़्वाहिशों पर आज तक टाला मुझे
क्यूँ बनाया मुझ को आख़िर, क्यूँ मिटा डाला मुझे
چند مردہ خواہشوں پر آج تک ٹالا مجھے
کیوں بنایا مجھ کو آخر، کیوں مٹا ڈالا مجھے

मरहबा तख़लीक़ तेरी, आफ़रीं रब्बानियत
रंज से मुझ को बनाया, अश्क पर पाला मुझे
مرہبہ تخلیق تیری، آفریں ربانیت
رنج سے مجھ کو بنایا، اشک سے پالا مجھے

धंसती जाती है ज़मीं, और रहना है क़ायम मक़ाम
आज़माइश के ये कैसे ग़ार में डाला मुझे
دھنستی جاتی ہے زمیں اور رہنا ہے قائم مقام
آزمائش کے یہ کیسے غار میں ڈالا مجھے

गुम कहाँ सब हो गईं रंगीनियाँ इस ज़ात की
क्यूँ हर इक मंज़र नज़र आए सदा काला मुझे
گُم کہاں سب ہو گئیں رنگینیاں اس ذات کی
کیوں ہر اک منظر نظر آئے سدا کالا مجھے

ज़हर कुछ ऐसा घुला बहते लहू की धार में
ख़ुद भी ज़ख़्मी हो गया है मारने वाला मुझे
زہر کچھ ایسا گھُلا بہتے لہو کی دھار میں
خود بھی زخمی ہو گیا ہے مارنے والا مجھے

तल्खियों पर डाल कर शीरीं कलामी की रिदा
कह के अमृत दे गया है ज़हर का प्याला मुझे
تلخیوں پر ڈال کر شیریں کلامی کی ردا
کہہ کے امرت دے گیا ہے زہر کا پیالہ مجھے

कोई तो हद हो मुक़र्रर दर्द--लामहदूद की
और अब कितनी अज़ीयत देगा ये छाला मुझे
کوئی تو حد ہو مقرر دردِ لامحدود کی
اور اب کتنی عذیت دیگا یہ چھالا مجھے

चढ़ते दरिया की ख़ुशामद की नहीं मैं ने कभी
प्यास ने "मुमताज़" रक्खा बरतर--बाला मुझे
چڑھتے دریا کی خوشامد کی نہیں میں نے کبھی 
پیاس نے ممتازؔ رکھا برتر و بالا مجھے

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