शर ख़ेज़ हैं ज़माने के हालात किस क़दर


शर ख़ेज़ हैं ज़माने के हालात किस क़दर
दिल में उतर गए हैं ख़राबात किस क़दर
شر خیز ہیں زمانے کے حالات کس قدر
دل میں اتر گئے ہیں خرابات کس قدر

नफ़रत के कितने ख़ानों में बिखरा है आदमी
क़ालिब को बाँट देते हैं तबक़ात किस क़दर
نفرت کے کتنے خانوں میں بکھرا ہے آدمی
قالب کو بانٹ دیتے ہیں طبقات کس قدر

हद है कि चंद सिक्कों में बिकने लगा ज़मीर
इंसाँ को तोड़ देती हैं हाजात किस क़दर
حد ہے کہ چند سکوں میں بکنے لگا ضمیر
انساں کو توڑ دیتی ہیں حاجات کس قدر

शैतान अपनी चालों में कितना है कामयाब
कम हो गए हैं दुनिया से हसनात किस क़दर
شیطان اپنی چالوں میں کتنا ہے کامیاب
کم ہو گئے ہیں دنیا سے حسنات کس قدر

बनने लगा है अब तो हर इक राई का पहाड़
चुभने लगी दिलों को हर इक बात किस क़दर
بننے لگا ہے اب تو ہر اک رائی کا پہاڑ
چبھنے لگی دلوں کو ہر اک بات کس قدر

तकते हैं हम फ़लक को सहर की उम्मीद में
यारो तवील होने लगी रात किस क़दर
تکتے ہیں ہم فلک کو سحر کی امید میں
یارو طویل ہونے لگی رات کس قدر

शम्स-ओ-मह-ओ-नजूम सभी हो गए क़लील
“मुमताज़” हम पे तारी हैं ज़ुल्मात किस क़दर
شمس و مہہ و نجوم سبھی ہو گئے قلیل
ممتازؔ ہم پہ طاری ہیں ظلمات کس قدر
शर ख़ेज़ – झगड़े फैलाने वाले, ख़राबात – वीराने, ख़ानों – कोष्ठों, क़ालिब – दिलों, तबक़ात – वर्ग, हाजात – ज़रूरतें, हसनात – भलाइयाँ, फ़लक – आसमान, सहर – सुबह, तवील – लंबी, शम्स – सूरज, मह – चाँद, नजूम – तारे, क़लील – कम, तारी – छाए हुए, ज़ुल्मात – अँधेरे

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