हम कहाँ हैं हमें ख़बर भी नहीं

हम कहाँ हैं हमें ख़बर भी नहीं
रास्ता कोई मोतबर भी नहीं

हम ने तामीर जो किया है जहाँ
उसमें इक साया-ए-शजर भी नहीं

सोच की वुसअतें फ़लक से परे
पाँव बोझल हैं, बाल-ओ-पर भी नहीं

सर पे शमशीर-ए-ख़ौफ़-ए-दुनिया भी
और बग़ावत बिना बसर भी नहीं

संग आते हैं किस उम्मीद पे अब
पेड़ पर अब कोई समर भी नहीं

ये तज़ाद-ए-हयात क्या कहिए
रोए हैं और आँख तर भी नहीं

हम नहीं ख़ुश ये इक हक़ीक़त है
हम मगर इतने मुंतशर भी नहीं

जिस पे मुमताज़ रख के सर रोएँ
ऐसा अब कोई संग-ए-दर भी नहीं


मोतबर भरोसेमंद, शजर पेड़, वुसअतें फैलाव, फ़लक आसमान, शमशीर तलवार, समर फल, तज़ाद-ए-हयात जीवन का विरोधाभास, मुंतशर बिखरा हुआ, संग-ए-दर दहलीज़ का पत्थर 

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