ग़ज़ल - तसव्वारात के हुबाब दे गया मुझे



तसव्वारात के हुबाब दे गया मुझे
उम्मीद के कई अज़ाब दे गया मुझे

उठा गया है रूह में सुलगता इन्क़िलाब
हर एक पल में सौ इताब दे गया मुझे

भटक रहे हैं चार सू वो ख़्वाब ए बे बहा
हक़ीक़तों का इक सराब दे गया मुझे

वजूद जल के ख़ाक हो गया, कि आज वो
सुलगते दिल का इक शेहाब दे गया मुझे

निगाहों का हर इक नज़ारा भीगता गया
न जाने कितने टूटे ख़्वाब दे गया मुझे

बहार के लहू से बुझती है ख़िज़ाँ की प्यास
तो आख़िरश वो ये जवाब दे गया मुझे 

कि बारिशों में धुल के खिल उठी ज़मीन ए दिल
समन्दरों में इक दोआब दे गया मुझे

अताएँ बेशुमार हैं, अज़ाब बेबहा
हर एक लम्हे का हिसाब दे गया मुझे 

यक़ीन को सज़ा ए बेयक़ीनी दे गया
किताब ए ज़ीस्त का निसाब दे गया मुझे

जला है तार तार दामन ए उम्मीद का
वो "नाज़ाँ" कितने आफ़ताब दे गया मुझे

तसव्वुरात के-कल्पनाओं के, हुबाब-बुलबुले, अज़ाब-यातना, इताब-ग़ुस्सा, बेबहा-अनमोल, सराब-मरीचिका, शेहाब-आग का गोला, आख़िरश-आखिरकार, दोआब-द्रीय का वो हिस्सा जो ज़मीन निकाल आने से दो धारों में बंट गया हो, ज़ीस्त-जीवन, निसाब-SYLLABUS, आफ़ताब-सूरज   

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