उल्फ़तों को धो रहे हो

उल्फ़तों को धो रहे हो
कितनी नफ़रत बो रहे हो

होश हमवतनो संभालो
नींद कैसी सो रहे हो

बन रहे हो क्यूँ तमाशा
अब भरम भी खो रहे हो

हैं बुरी दुनिया की नज़रें
बेरिदा क्यूँ हो रहे हो

दुश्मनी का बोझ भारी
क्यूँ सरों पर ढो रहे हो

चुप रहो मुमताज़ नाज़ाँ

किसके आगे रो रहे हो 

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