पलट के दूर से अक्सर सदाएं देता है

पलट के दूर से अक्सर सदाएं देता है
तलब तो ज़हर की है, वो दवाएं देता है

पलट के आ कभी इस सिम्त अब्र ए आवारा
तुझे सुलगता ये सहरा सदाएं देता है

लिबास उतार के हर बार ज़र्द पत्तों का
नई, दरख्तों को मौसम क़बाएं देता है

अजीब ढंग से करता है दुश्मनी वो भी
कि ज़िन्दगी कि मुझे वो दुआएं देता है

बुझाते फिरते हैं जो लोग हस्तियों के चिराग़
उन्हें भी मेहर ये अपनी शुआएँ देता है

सुनाई देती है आहट बहार की जब भी
वो मेरी रूह को सौ सौ खिजाएँ देता है

ज़रा सी बुझने जो लगती है दिल की आग कभी
ग़म ए हयात उसे फिर हवाएं देता है

है जिस की रूह भी "मुमताज़" तार तार बहुत
वो शख्स नंगे सरों को रिदाएँ देता है


इस सिम्त- इस तरफ, अब्र-ए-आवारा-आवारा बादल, सहरा- रेगिस्तान, ज़र्द पत्तों का- पीले पत्तों का, क़बाएं- पोशाकें, मेहर- सूरज, शुआएँ- किरणें, खिजाएँ- पतझड़, हयात-ज़िंदगी, रूह-आत्मा, रिदाएँ- चादरें 

Comments

Popular posts from this blog

फ़र्श था मख़मल का, लेकिन तीलियाँ फ़ौलाद की

भड़कना, कांपना, शो'ले उगलना सीख जाएगा

किरदार-ए-फ़न, उलूम के पैकर भी आयेंगे