ले आईं किस मक़ाम पर हमें हमारी चाहतें

ले आईं किस मक़ाम पर हमें हमारी चाहतें
कहाँ गए वो रात दिन, कहाँ गईं वो राहतें

ये नफरतों की सरज़मीं प् रंजिशों की बारिशें
जलाती जाती हैं दिए अँधेरे में मोहब्बतें

ये तपती धूप की चुभन, ये तश्नगी की इन्तहा
ये सहरा ए हयात में मोहब्बतों की हाजतें

पलक पलक सराब है, नफ़स नफ़स अज़ाब है
ये क़तरा क़तरा ज़िन्दगी, ये दर्द ओ ग़म की इशरतें

हयात जल के रह गई, वजूद भी झुलस गया
ये तपते सहरा का सफ़र, मक़ाम की ये मुद्दतें

मिलें तो कैसे मंजिलें, अभी सफ़र तवील है
शिकस्ता पा है ज़िन्दगी, थकी थकी हैं हसरतें

ये राहतों की इन्तेहा, तड़पती है हर इक ख़ुशी
हमें मिटाए देती हैं हयात की इनायतें

वो "नाज़ाँ" ख़्वाब ख़्वाब सा सफ़र तमाम हो गया
न जाने खो गईं कहाँ वो क़ुर्बतें, वो चाहतें


तश्नगी-प्यास, सहरा ए हयात- ज़िन्दगी की मरुभूमि, सराब-मृगतृष्णा, नफ़स-सांस, अज़ाब-यातना, हयात-ज़िन्दगी, शिकस्ता पा- थके हुए पाँव, क़ुर्बतें- नज़दीकियाँ

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