हैरत से देखता है अभी आसमाँ मुझे

परवाज़ अब के जो है मिली बेतकाँ मुझे
हैरत से देखता है अभी आसमाँ मुझे

झुक कर उसी मक़ाम पे रख दूं जबीन ए शौक़
मिल जाए तेरा नक्श ए कफ़ ए पा जहाँ मुझे

पर काटने थे जब, तो रिहा फिर किया ही क्यूँ
गुफ़्तार छीननी थी, तो क्यूँ दी जुबां मुझे

इस जुस्तजू में अब मैं उफ़क़ तक तो आ गई
ले जाए और तेरा तअक्क़ुब कहाँ मुझे

कब तक मुझे मिटाता रहेगा मेरा जुनूँ
लिक्खेगी कितनी बार मेरी दास्ताँ मुझे

होंटों तक आ के फूटा पियाला हज़ार बार
क़िस्मत का ये मिज़ाज गरां है गरां मुझे

खुशियाँ मिलीं, तो वो भी मिलीं मुझ को बेहिसाब
ग़म भी मिला, तो वो भी मिला बेकराँ मुझे

"मुमताज़" गम हूँ कब से मैं राहों के तूल में
कब से पुकारता है तेरा आस्तां मुझे


परवाज़-उड़ान, बेतकां-न थकने वाली, मक़ाम-जगह, जबीन ए शौक़-प्यार का माथा, नक्श ए कफ़ ए पा-पाँव का निशान, गुफ़्तार-बात करने की क्षमता, जुस्तजू-खोज, उफ़क़-क्षितिज, तअक्क़ुब-पीछा करना, जुनूँ-पागलपन, दास्ताँ-कहानी, गरां-भारी, बेकराँ-अनंत, तूल-लम्बाई, आस्तां-चौखट  

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