ग़ज़ल - दम ब दम खौल रहा है मुझ में

दम ब दम खौल रहा है मुझ में
एक लावा सा दबा है मुझ में
دم بہ دم کھول رہا ہے مجھ میں
ایک لاوا سا دبا ہے مجھ میں

धड़कनें दिल में हज़ारों हैं अभी
अब भी इक ख़्वाब बचा है मुझ में
دھڑکنیں دل میں ہزاروں ہیں ابھی
اب بھی اک خواب بچا ہے مجھ میں

ज़ब्त की टूट न जाए दीवार
कोई तूफ़ान रुका है मुझ में
ضبط کی ٹوٹ نہ جاۓ دیوار
کوئ طوفان رکا ہے مجھ میں

कितनी रंगीन है फ़ज़ा दिल की
कुछ तो है, कुछ तो खिला है मुझ में
کتنی رنگین ہے فضا دل کی
کچھ تو ہے، کچھ تو کھِلا ہے مجھ میں

शोला रेज़ों से खेलना चाहे
एक बच्चा जो छुपा है मुझ में
شعلہ ریزوں سے کھیلنا چاہے
ایک بچہ، جو چھپا ہے مجھ میں

सब मिटा जाता है रफ़्ता रफ़्ता
जाने कैसी ये वबा है मुझ में
سب مٹا جاتا ہے رفتہ رفتہ
جانے کیسی یہ وبا ہے مجھ میں

जल रहा है वजूद मुद्दत से
एक महशर सा बपा है मुझ में
جل رہا ہے وجود مدت سے
ایک محشر سا بپا ہے مجھ میں

गिर के टूटा है कोई ख़्वाब अभी
इक छनाका सा हुआ है मुझ में
گر کے ٹوٹا ہے کوئ خواب ابھی
اک چھناکا سا ہوا ہے مجھ میں

मुंतशिर है तमामतर हस्ती
मेरा किरदार बँटा है मुझ में
منتشر ہے تمام تر ہستی
میرا کردار بٹا ہے مجھ میں

इक ख़ला सा है रूह से दिल तक
कुछ तो “मुमताज़” मिटा है मुझ में
اک خلا سا ہے روح سے دل تک
کچھ تو "ممتاز" مٹا ہے مجھ میں 

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