नाइन-इलेवन


     
पल वो नौ ग्यारह के, वो मजबूरियों का सिलसिला
वो क़यामत खेज़ मंज़र, हादसा दर हादसा
मौत ने लब्बैक उस दिन कितनी जानों पर कहा
कौन कर सकता है आख़िर उन पलों का तजज़िया

हादसा कहते हैं किस शै को, बला क्या चीज़ है
डूबना सैलाब ए आतिश में भला क्या चीज़ है
मौत से आँखें मिलाने की भला हिम्मत है क्या
जिन पे गुजरी थी, ये पूछो उन से, ये दहशत है क्या

पूछना है गर तो पूछो बूढ़ी माओं से ज़रा
जिन के लख्त ए दिल को उन मुर्दा पलों ने खा लिया
उन यतीमों से करो दरियाफ़्त, ग़म होता है क्या
लम्हों में रहमत का साया जिन के सर से उठ गया

है क़ज़ा का ज़ुल्म क्या, बेवाओं को मालूम है
अश्क के क़तरों में पिन्हाँ कौन सा मफ़हूम है
क्या बताएं, किस क़दर बदबख्त ये मरहूम हैं
जो कफ़न क्या, लाश के रेजों से भी महरूम हैं

हैं कई ऐसे भी, जिन की ज़िन्दगी की राह में
सिर्फ़ आँसू, सिर्फ़ आहें, सिर्फ़ नाले रह गए
जिन की तन्हा रूह के जलते सहीफ़े में तो अब
बाब ए हसरत के सभी औराक़ काले रह गए

जिस जगह टूटी बला ए नागहाँ अफ़लाक से
उस ज़मीं के ज़ख्म अश्कों से सभी धोते रहे
उस सिफ़र मैदान में फ़सलें तड़प की हैं उगी
ज़र्रे ज़र्रे में जहाँ आँसू सभी बोते रहे

ये जुनूँ, ये क़त्ल, ये बरबादियों का सिलसिला
कौन जीता, खेल कर जानों से किस को क्या मिला
आदमीयत को जो नफ़रत का कफ़न पहना गया
फ़ितना दहशतगर्दियों का ये कहाँ से आ गया

देखिये ये फ़ितनासाज़ी अब कहाँ तक जाएगी
इन की ये दीवानगी क्या क्या क़यामत ढाएगी
जाने क्या क्या ये बला दहशत की अब दिखलाएगी
देखना, दहशत की डायन कितनी जानें खाएगी

क्या शुजाअत है, कि छुप कर वार करते हैं ये मर्द
कुफ़्ल है इन के दिलों पर, इन के हैं जज़्बात सर्द
गुमरही की तीरगी में कब भला जागा है दर्द
जम गई है इन के दिल पर जाने किस रस्ते की गर्द

जो ख़बर बनता है, अक्सर बेख़बर होता ही है
ज़ुल्म का हर एक रस्ता पुरख़तर होता ही है
ज़ुल्म के पेड़ों पे नफ़रत का समर होता ही है
आह में मज़लूम की आख़िर असर होता ही है  
 
आह जब उट्ठे, तो पत्थर को हिला देती है आह
रायगाँ मज़लूम की जा ही नहीं सकती कराह
बेबसी की सिसकियों से हार जाता है गुनाह
किबरिया जिस से ख़फ़ा हो, कौन दे उस को पनाह

ऐ गुनहगार ए बशर, अपना ख़याल ए ख़ाम देख
कैसे कैसे तेरे दिल पर छाए हैं औहाम, देख
देख, अपनी कजकुलाही की ये काली शाम देख
सरकशों का कैसा इबरतनाक है अंजाम, देख

इस कहानी का भी आख़िर हो गया यूँ इख्तेताम
बच नहीं सकता कोई, फेंके क़ज़ा जब अपना दाम
वक़्त के फ़िरऔन को ख़ाक ए वतन भी थी हराम
खो गया मौज ए समंदर में वो दहशत का निज़ाम

हादसा दर हादसा-सिलसिलेवार हादसे, तजज़िया-हिसाब किताब, लब्बैक-हाज़िर हूँ, लख्त ए दिल-दिल का टुकड़ा, दरियाफ़्त करना-पूछना, दहशत-आतंक, सैलाब ए आतिश-आग का सैलाब, पिन्हाँ-छुपा, मफ़हूम-मतलब, बदबख्त-बदक़िस्मत, मरहूम-मरे हुए लोग, सहीफ़े में-किताब में, बाब ए हसरत- इच्छाओं का पाठ, औराक़-पन्ने, बला ए नागहाँ-अचानक आने वाली मुसीबत, अफ़लाक से-आसमानों से, सिफ़र मैदान-GROUND ZERO, शुजाअत-बहादुरी, कुफ़्ल-ताला, तीरगी-अँधेरा, पुरख़तर-खतरों से भरा हुआ, समर-फल, मज़लूम-पीड़ित, रायगाँ-बेकार, किबरिया-भगवान्, गुनहगार ए बशर-इंसान का अपराधी, ख़याल ए ख़ाम-झूठा ख़याल, औहाम-वहम, कजकुलाही-अकड़, सरकशों का-हद से गुजरने वालों का, इबरत नाक-सबक देने वाला, इख्तेताम-अंत, क़ज़ा-मौत, दाम-जाल, फ़िरऔन-मिस्र का राजा, जो ख़ुद को भगवान कहता था, ख़ाक ए वतन-देश की मिटटी, मौज ए समंदर-समंदर की लहर, निज़ाम-कानून      

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