शाम


वक़्त के ज़र्रों प जब हो मेहर-ए-ताबाँ का ज़वाल
शब की तारीकी से हो दिन के उजाले का विसाल
करवटें जब ले रहा हो रोज़-ओ-शब का ये निज़ाम
नूर का तब खोल कर पर्दा निकाल आती है शाम

अब्र के रुख़ पर गुलाबी रंग फैलाती हुई
इक हसीना की तरह लहराती इठलाती हुई
चहचहाते पंछियों के रूप में गाती हुई
आस्माँ के रुख़ पे अपनी जुल्फ़ बिखराती हुई

मेहर की किरनों की अफ़शाँ जुल्फ़ में चुनती हुई
बादलों से फिर उफ़क़ पर लाल रंग बुनती हुई
मुस्कराती है, लजाती है, जलाती है दिये
फिर सियाही से सजा देती है दिन के ज़ाविए
रंग पहले भरती है क़ुदरत की तसवीरों में शाम
रफ़्ता रफ़्ता घेर लेती हैं सभी दीवार-ओ-बाम

चंद लम्हों में उतरने लगती है फिर रात में
ग़र्क़ हो जाती है आख़िर दरिया-ए-ज़ुल्मात में
हो हसीं वो लाख, वो कितनी भी गुलअंदाम हो
हर सुनहरी शाम का लेकिन यही अंजाम हो

हुस्न की रंगीनियों पर भी फ़ना आती ही है
कोई भी शय हो, कि वो अंजाम को पाती ही है

मेहर-ए-ताबाँ-चमकता हुआ सूरज, ज़वाल-पतन, विसाल-मिलन, रोज़-ओ-शब-रात और दिन, निज़ाम-व्यवस्था, अब्र-बादल, मेहर-सूरज, अफ़शाँ-glitter dust, उफ़क़-क्षितिज, ज़ाविए-दिशाएँ, बाम-छत, ग़र्क़-डूबना, ज़ुल्मात-अंधेरे, गुलअंदाम-फूल के जैसा बदन

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