कोई तो ऐसा इन्क़लाब आए


कोई तो ऐसा इन्क़लाब आए
हर अज़ीयत का अब जवाब आए

काम आती हैं ख़ूब आँखें भी
बात करने में जब हिजाब आए

जाने किस रोग की अलामत है
जागती आँखों में भी ख़्वाब आए

वो नज़र भर के देख ले जब भी
बारहा लौट कर शबाब आए

हम ख़िज़ाँ से क़दम मिला के चलें
वो बहारों के हमरक़ाब आए

चल दिया जब वो फेर कर नज़रें
एक लम्हे में सौ अज़ाब आए

नश्शा महफ़िल प क्यूँ न तारी हो
जब कि साग़र ब कफ़ शराब आए

हो गया है अज़ाब जीना भी
ऐसे दिन भी कभी ख़राब आए

आफ़रीं है हमारी ज़िन्दा दिली
आए दिल पर जो अब अज़ाब आए

तेरी महफ़िल से ऐ सितम परवर
ले के “मुमताज़” इज़्तिराब आए

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