अक्स से अपने नज़र अब मैं मिलाऊं कैसे


अक्स  से  अपने  नज़र  अब  मैं  मिलाऊं  कैसे
सर  पे  ये  बार  निदामत  मैं  उठाऊं  कैसे

बोझ  हो  जाता  है  इंसान  को  ख़ुद  अपना  वजूद
टूटे  कांधों  पे  ये  अब  बोझ  उठाऊं  कैसे

क्या  ख़बर  वक़्त  के  कोहरे  में  छुपा  क्या  होगा
अंधी  तक़दीर  पे  सरमाया  लुटाऊं  कैसे

भूल  बैठी  है  मेरी  ज़िन्दगी  हंसने  का  हुनर
मुस्कराने  का  इसे  ढंग  सिखाऊं  कैसे

लिख  तो  दूं  कोई  नई दास्ताँ  दिल  पे  लेकिन
नाम  जो  लिक्खा  है  अब  तक  वो  मिटाऊं  कैसे

मसलेहत  समझे  कोई  और    कोई  बात  सुने
ऐसी  मुंहज़ोर  तमन्ना  से  निभाऊं  कैसे

एक  उम्मीद  की  ज़ंजीर  क़दम  थामे  है
उठ  के  जाऊं  तो  तेरे  दर  से  मैं  जाऊं  कैसे

जब  तलक  सांस  है , रिश्तों  को  तो  ढोना  है  मगर
"बात  ये  घर  की  है , बाज़ार  में  लाऊं  कैसे "

दिल  में  जो  आग  सी  'मुमताज़' जला  करती  थी
बुझने  वाली  है , इसे  अब  मैं  जलाऊं  कैसे


عکس  سے  اپنے  نظر  اب  میں  ملاؤں  کیسے
سر  پہ  یہ  بار_ندامت  میں  اٹھاؤں   کیسے

بوجھ  ہو  جاتا  ہے  انسان  کو  خود  اپنا  وجود
ٹوٹے  کاندھوں  پہ  یہ  اب  بوجھ  اٹھاؤں  کیسے

کیا  خبر  وقت  کے  کہرے  میں  چھپا  کیا  ہوگا
اندھی  تقدیر  پہ   سرمایہ  لوٹاؤں  کیسے

بھول  بیٹھی  ہے  مری  زندگی  ہنسنے  کا  ہنر
مسکرانے  کا  اسے  ڈھنگ  سکھاؤں  کیسے

لکھ  تو  دوں  کوئی  نئی  داستاں  دل  پہ  لیکن
نام  جو  لکّھا  ہے  اب  تک  وہ  مٹاؤں  کیسے

مصلحت  سمجھے  کوئی  اور  نہ  کوئی  بات  سنے
ایسی  منھ زور  تمنا  سے  نبھاؤں  کیسے

ایک  امید  کی  زنجیر  قدم  تھامے  ہے
اٹھ  کے  جاؤں  تو  ترے  در  سے  میں  جاؤں  کیسے

جب  تلک  سانس  ہے , رشتوں  کو  تو  ڈھونا  ہے  مگر
"بات  یہ  گھر  کی  ہے , بازار  میں  لاؤں   کیسے "

دل  میں  جو  آگ  سی  'ممتاز ' جلا  کرتی  تھی
بجھنے  والی  ہے , اسے  اب  میں  جلاؤں  کیسے


Comments

Popular posts from this blog

फ़र्श था मख़मल का, लेकिन तीलियाँ फ़ौलाद की

भड़कना, कांपना, शो'ले उगलना सीख जाएगा

किरदार-ए-फ़न, उलूम के पैकर भी आयेंगे