माज़ी के अलम हाल को खाने नहीं आते


माज़ी  के  अलम  हाल  को  खाने  नहीं  आते
वापस  तो  पलट  कर  वो  ज़माने  नहीं  आते

कितना  है  बयाबान  मेरी  ज़ात  का  जंगल
अरमाँ  भी  यहाँ  शोर  मचाने  नहीं  आते

जो  आँख  को  मोती  मिले , लौटाएँ  किसे  हम
क़र्ज़े  ये  अभी  हम  को  चुकाने  नहीं  आते

तन्हाई  की  वो  हद  है  के  साया  भी  नहीं  साथ
वो  ख़्वाब  भी  अब  हम  को  रुलाने  नहीं  आते

मालूम  जो  होती  हमें  उल्फ़त  की  हक़ीक़त
हम  ख़्वाब  यहाँ  अपने  गँवाने  नहीं  आते

बन  जाती  हैं  आईना  तमन्नाओं  का  अक्सर
"आँखों  को  अभी  ख़्वाब  छुपाने  नहीं  आते "


ماضی  کے  الم  حال  کو  کھانے  نہیں  آتے
واپس  تو  پلٹ  کر  وہ   زمانے  نہیں  آتے

کتنا  ہے  بیابان  مری  ذات  کا  جنگل 
ارماں  بھی  یہاں  شور  مچانے  نہیں  آتے

جو  آنکھ  کو  موتی  ملے , لوٹائیں  کسے  ہم
قرضے  یہ  ابھی  ہم  کو  چکانے  نہیں  آتے

تنہائی  کی  وہ   حد  ہے  کہ   سایہ  بھی  نہیں  ساتھ
وہ  خواب  بھی  اب  ہم  کو  رلانے  نہیں  آتے

معلوم  جو  ہوتی  ہمیں  الفت  کی  حقیقت
ہم  خواب  یہاں  اپنے  گنوانے  نہیں  آتے

بن  جاتی  ہیں  آئینہ  تمنناؤں  کا  اکثر
"آنکھوں  کو  ابھی  خواب  چھپانے  نہیں  آتے "




maazi ke alam haal ko khaane nahiN aate
waapas to palat kar wo zamaane nahiN aate

kitna hai bayaabaan meri zaat ka jungle
armaaN bhi yahaN shor machaane nahiN aate

jo aankh ko moti mile, lautaaeN kise ham
qarze ye abhi ham ko chukaane nahin aate

tanhaai ki wo had hai ke saaya bhi nahiN saath
wo khwaab bhi ab ham ko rulaane nahiN aate

maaloom jo hoti hameN ulfat ki haqeeqat
ham khwaab yahan apne ganwaane nahiN aate

ban jaati haiN aaina tamannaoN ka aksar
"aankhoN ko abhi khwaab chhupaane nahiN aate"

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