अबस हर आरज़ू ठहरी , हैं सारे ख़्वाब बेगाने


अबस  हर  आरज़ू  ठहरी , हैं  सारे  ख़्वाब  बेगाने
तसव्वर  बुन  रहा  है  कितने ही  बेबाक  अफ़साने

अभी  तो  ज़हन  से  खून तमन्ना  साफ़  करना  है
अभी  हम  आए  हैं  जज़्बात  की  मय्यत  को  दफ़नाने

अजब  सा  इक  नशा  है  अश्क  पीने  में  भी    यारो
खुले  हैं  ग़म कदों  में  भी    जाने  कितने  मैख़ाने

सिरा  मिलता  नहीं  उलझी  हुई  इस  ज़िन्दगानी  का
  जाने  कब  से  बैठी  हूँ  मैं  इन  धागों  को  सुलझाने

कहाँ  गुम  हो  गया  बचपन  का  वो  मासूम  सा  आलम
  वो  उल्फ़त ,   वो  मस्ती ,   वो  मुखलिस  से  याराने

कहीं  ढूंढे  से  भी  अपना  नज़र  आता  नहीं  कोई
यहाँ  इस  मोड़  पर  यूँ  तो  सभी  चेहरे  हैं  पहचाने

मैं  कब  से  सोच  में  गुम  हूँ , किसे  ढूँढूं, कहाँ  जाऊं
  जाने  क्या  जगह  है  ये , सभी  रस्ते  हैं  अनजाने

बड़ी  मुश्किल  से  हम  ने  दिल  का  हर  रेज़ा  संभाला  था
हज़ारों  हसरतें  फिर    गई  हैं  हम  को  बहकाने

वही  गिरिया , वही  वहशत , वही  हर  सम्त  तारीकी
कहाँ  ले  जाएं  अब  'मुमताज़' हम  इस  जी  को  बहलाने
अबस=बेकार, बेगाने= पराए, मुखलिस= सच्चे, रेज़ा= टुकड़ा, गिरियाँ= रोना धोना, सिम्त= तरफ, तारीकी= अँधेरा


عبث ہر  آرزو  ٹھہری , ہیں  سارے  خواب  بیگانے
تصوّر  بن  رہا  ہے  کتنے  ہی  بیباک  افسانے

ابھی  تو  ذہن  سے  خون_تمنا صاف  کرنا  ہے
ابھی  ہم  آئے   ہیں  جذبات  کی  میّت  کو  دفنانے

عجب  سا  اک  نشہ  ہے  اشک  پینے  میں  بھی  ہے  یارو
کھلے  ہیں  غمکدوں  میں  بھی  نہ  جانے  کتنے  میخانے

سرا  ملتا  نہیں  الجھی  ہوئی  اس  زندگانی  کا
نہ  جانے  کب  سے  بیٹھی  ہوں  میں  ان  دھاگوں  کو  سلجھانے

کہاں  گم  ہو  گیا  بچپن  کا  وہ  معصوم  سا  عالم
نہ  وہ  الفت , نہ  وہ  مستی , نہ  وہ  مخلص  سے  یارانے

کہیں  ڈھونڈے  سے  بھی  اپنا  نظر  آتا  نہیں  کوئی
یہاں  اس  موڑ پر  یوں  تو  سبھی  چہرے  ہیں  پہچانے

میں  کب  سے  سوچ  میں  گم  ہوں , کسے  ڈھونڈوں, کہاں  جاؤں 
نہ  جانے  کیا  جگہ  ہے  یہ , سبھی  رستے  ہیں  انجانے

بڑی مشکل  سے  ہم  نے  دل  کا  ہر ریزہ سمبھالا  تھا
ہزاروں  حسرتیں  پھر  آ  گئی  ہیں  ہم  کو  بہکانے

وہی  گریاں , وہی  وحشت , وہی  ہر  سمت  تاریکی
کہاں  لے  جائیں اب  'ممتاز ' ہم  اس  جی  کو  بہلانے

abas har aarzoo thehri, haiN saare khwaab begaane
tasawwar bun raha hai kitne hi bebaak afsaane

abhi to zehn se khoon e tamanna saaf karna hai
abhi ham aae haiN jazbaat ki mayyat ko dafnaane

ajab sa ik nasha hai ashk peene meN bhi aye yaaro
khule haiN ghamkadoN meN bhi na jaane kitne maikhaane

siraa milta nahin uljhi hui is zindgaani ka
na jaane kab se baithi hoon maiN in dhaagoN ko suljhaane

kahaN gum ho gaya bachpan ka wo maasoom sa aalam
na wo ulfat, na wo masti, na wo mukhlis se yaaraane

kahiN dhoonde se bhi apna nazar aata nahiN koi
yahaN is mod par yuN to sabhi chehre haiN pehchaane

maiN kab se soch meN gum hooN, kise dhoonduN, kahaN jaauN
na jaane kya jagah hai ye, sabhi raste haiN anjaane

badi mushkil se ham ne dil ka har rezaa sambhaala tha
hazaaroN hasrateN phir aa gai haiN ham ko bahkaane

wahi giriyaaN, wahi wahshat, wahi har samt taareeki
kahaN le jaaeN ab 'Mumtaz' ham is jee ko bahlaane


Comments

  1. खूबसूरत पेशकश ... खुदा आपको सलामत रखे !!

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