आज के दौर के तुंद माहौल में

आज के दौर के तुंद माहौल में
ख़ून-ए-इंसानियत यूँ उछलता रहा
आदमीयत, अना, प्यार, ख़ुद्दारी का
क़त्ल होता रहा, ज़ुल्म पलता रहा

रात और दिन की इन गर्दिशों में जहाँ
इक तरफ़ जश्न है, इक तरफ़ यास है
अहल-ए-महफ़िल को इस का पता तक नहीं
अहल-ए-ग़ुर्बत पे क्या दौर चलता रहा

घर की ख़ातिर वतन छोड़ आए थे जो
उनको शहरों की ज़िन्दादिली खा गई
शाहज़ादों की इशरत की तस्वीर में
भर के ख़ूँ उनका लाशा निकलता रहा

ये सियासत बड़ी क़ीमती चीज़ है
क्या बताएँ चुकाना पड़ा मोल क्या
ठेकेदारी सियासत की चलती रही
और कश्मीर-ओ-गुजरात जलता रहा

जब भी अंगड़ाइयाँ ले के उट्ठी ख़ुशी
तब दबे पाँव ग़म की भी आमद हुई
ज़िन्दगी के हर इक मोड़ यूँ हुआ
धूप और छाँव का खेल चलता रहा

तुंद बिगड़ा हुआ, यास उदासी, ग़ुर्बत ग़रीबी, इशरत ऐश, आमद आगमन 

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