वक़्त से टूटे हर इक लम्हे की तकरार हूँ मैं

वक़्त से टूटे हर इक लम्हे की तकरार हूँ मैं
नाज़ है जिस पे मुक़द्दर को वो शहकार हूँ मैं

अपनी हस्ती के लिए ख़ुद ही इक आज़ार हूँ मैं
वक़्त के दोश पे रक्खा हुआ इक बार हूँ मैं

क्या कहूँ कौन सी उलझन में गिरफ़्तार हूँ मैं
कैसे कह दूँ कि तेरे हिज्र की बीमार हूँ मैं

ये तमन्नाओं की महरूमी ये शब की वुसअत
सो गई रात भी लेकिन अभी बेदार हूँ मैं

क्या करूँ, क्या न करूँ, कैसे जियूँ, क्यूँ मैं जियूँ
आजकल ऐसी ही उलझन से तो दोचार हूँ मैं

क़ैद हूँ अपनी ही सोचों के क़वी हलक़े में
अपनी ही राह में हाइल कोई कोहसार हूँ मैं

ऐसा लगता है सराबों के परे है मंज़िल
वक़्त के जलते हुए सहरा के इस पार हूँ मैं

मस्लेहत कोश अज़ाबों के भरे दलदल में
आरज़ूओं के हसीं ख़्वाब का इज़हार हूँ मैं

पाँव बोझल हैं, बदन चूर थकन से मुमताज़
अपनी नाकाम तमन्नाओं से बेज़ार हूँ मैं


तक़रार दोहराव, आज़ार बीमारी, दोश कांधा, बार बोझ, वुसअत विस्तार, बेदार जागना, क़वी मज़बूत, हलक़े में घेरे में, हाइल अडा हुआ, कोहसार पहाड़, सराबों के परे मरीचिकाओं के पीछे, मस्लेहत कोश दुनियादारी को झेलने वाला, अज़ाबों के यातनाओं के, इज़हार ज़ाहिर करना 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हर तरफ़ वीरानियाँ, हर तरफ़ तारीक रात

ग़ज़ल - करो कुछ तो हँसने हँसाने की बातें

ग़ज़ल - जब निगाहों में कोई मंज़र पुराना आ गया