जब अपनी ज़िन्दगी से तंग सू-ए-दश्त हम निकले

जब अपनी ज़िन्दगी से तंग सू-ए-दश्त हम निकले
तो हमसफ़री की ख़ातिर साथ सब रंज-ओ-अलम निकले

न जुरअत करते टकराने की जो पहले समझ जाते
ज़माने के रिवाज-ओ-रस्म भी परबत जज़म निकले

बड़ा था नाज़ ख़ुद पर, मैं नहीं डरती ज़माने से
ज़माने के इरादे मेरे हाथों पर रक़म निकले

शिकस्ता हो के जब बिखरी ये हस्ती, होश तब आया
शहाना शान से आख़िर मेरे दिल के वहम निकले

ये आलम बारहा गुज़रा है हम पर तेरी क़ुर्बत में
लबों पर हो तबस्सुम और निगाह-ए-नाज़ नम निकले

ये दर-ब-दरी ये शौक़ आवारगी का और सफ़र की धुन
न वापस आ सके, इक बार जो घर से क़दम निकले

तेरी यादों के ये साए अलामत ज़िन्दगी की हैं
जो यादों का ये शीराज़ा बिखर जाए तो दम निकले

हमें इस इश्क़ ने मुमताज़ दीवाना बना डाला
जिन्हें माबूद रखते थे वो पत्थर के सनम निकले


सू-ए-दश्त जंगल की तरफ़, रंज-ओ-अलम दुख-दर्द, जज़म अटल, रक़म लिखा हुआ, शिकस्ता हो के टूट के, क़ुर्बत समीपता, तबस्सुम मुस्कराहट, अलामत निशानी, शीराज़ा बंधन, माबूद पूज्य, सनम मूर्ति 

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