नज़्म - क़ाबिज़


ऐ मेरी रातों की तनहाई के ख़ामोश रफ़ीक़
ऐ मेरे दिल के मकीं
ऐ मेरे ख़्वाबों के शफ़ीक़
मेरे जज़्बात में तूफ़ान उठाने वाले
मेरे ख़्वाबों पे
मेरे ज़हन पे छाने वाले
तू ने अरमान जगाए मेरे मुर्दा दिल में
छुप के रहने लगा पलकों के सुनहरे ज़िल में
मेरे एहसास-ए-सितमगर को हवा दी तू ने
मेरे सोए हुए नग़्मों को सदा दी तू ने
एक चिंगारी जो अब राख में गुम होने को थी
याद इक वक़्त की परतों में कहीं खोने को थी
वही चिंगारी भड़क उट्ठी है शोलों की तरह
ज़ख़्म ताज़ा हुए गुलमोहर के फूलों की तरह

मेरे महबूब
मेरे दोस्त
ऐ मेरे हमदम
ऐ बुत-ए-संग मेरे
ऐ मेरे पत्थर के सनम
मेरे एहसास पे क़ाबिज़ है तेरे प्यार का ग़म
मैं ने रक्खा है तेरी शोख़ अदाओं का भरम
वर्ना ऐसी तो नहीं
मुझ पे तेरी नज़र-ए-करम
कि मेरे टूटे हुए दिल को क़रार आ जाए
दिल-ए-ग़मगश्ता मेरा

जिससे सुकूँ पा जाए 

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