रेग-ए-रवाँ


सुना था ये कभी मैं ने
मोहब्बत का जो दरिया है
कभी सूखा नहीं करता
मगर ये सच नहीं यारो
कभी ऐसा भी होता है
मोहब्बत का ये दरिया
धीरे धीरे
सूख जाता है
वफाओं की हरारत से
जफाओं की तमाज़त से
अदाकारी की शिद्दत से
रियाकारी की जिद्दत से
कहीं दिल में
कोई रेग-ए-रवाँ तशकील पाता है

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