मेरे महबूब





मेरे महबूब, मेरी जान, मेरे होश रुबा
میرے محبوب، مری جان، میرے ہوش ربا
तेरी उल्फ़त ही मेरी ज़ात का सरमाया है
تیری الفت ہی میری ذات کا سرمایہ ہے
मेरी हर साँस तेरी साँस से मन्सूब हुई
میری ہر سانس تیری سانس سے منصوب ہوئی
मेरी धड़कन पे, मेरे दिल पे तेरा साया है
میری دھڑکن پہ میرے دل پہ ترا سایہ ہے

जाने कब आया मेरी ज़ीस्त में चुपके चुपके
جانے کب آیا میری زیست میں چپکے چپکے
जाने कब तू मेरे जीने का सबब बन बैठा
جانے کب تو مرے مرنے کا سبب بن بیٹھا
मेरे एहसास के हर गोशे पे क़ाबिज़ हो कर
میرے احساس کے ہر گوشے پہ قابض ہو کر
तेरा एहसास मेरा रख़्त-ए-तरब बन बैठा
تیرا احساس میرا رختِ طرب بن بیٹھا

सोचती हूँ, मेरी दुनिया में अगर तू न हुआ
سوچتی ہوں مری دنیا میں اگر تو نہ ہوا
इस तसव्वर से मेरी रूह लरज़ उठती है
اس تصور سے میری روح لرز اٹھتی ہے
दिल पे इक ख़ौफ़ सा तारी है न जाने क्यूँ अब
دل پہ اک خوف سا طاری ہے نہ جانے کیوں اب
जाने क्यूँ उल्फ़त-ए-मजरूह लरज़ उठती है
جانے کیوں الفتِ مجروح لرز اٹھتی ہے

मेरे जीने के लिए ज़ात तेरी लाज़िम है
میرے جینے کے لئے ذات تری لازم ہے
मेरे मरने के लिए तेरा इशारा है बहुत
میرے مرنے کے لئے تیرا اشارا ہے بہت
इक शरारा है तेरा प्यार कि हस्ती को मेरी
اک شرارا ہے ترا پیار کہ ہستی کو مری
ख़ाक करने के लिए एक शरारा है बहुत
خاک کرنے کے لئے ایک شرارا ہے بہت   

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

चलन ज़माने के ऐ यार इख़्तियार न कर

किरदार-ए-फ़न, उलूम के पैकर भी आयेंगे

हमारे बीच पहले एक याराना भी होता था