ग़ज़ल - तश्नगी को तो सराबों से भी छल सकते थे

तश्नगी को  तो  सराबों  से  भी  छल  सकते  थे 
इक  इनायत  से  मेरे  ख़्वाब  बहल  सकते  थे 

तुम  ने  चाहा  ही  नहीं  वर्ना कभी  तो  जानां 
मेरे  टूटे  हुए  अरमाँ भी  निकल  सकते  थे 

तुम  को  जाना  था  किसी  और  ही  जानिब, माना 
दो  क़दम  फिर  भी  मेरे  साथ  तो  चल  सकते  थे 

काविशों  में  ही  कहीं  कोई  कमी  थी , वर्ना 
ये  इरादे  मेरी  क़िस्मत  भी  बदल  सकते  थे 

रास    जाता  अगर  हम  को  अना  का  सौदा 
ख़्वाब  आँखों  के  हक़ीक़त में  भी  ढल  सकते  थे 

हम  को  अपनी  जो  अना  का  न  सहारा  मिलता 
लडखडाए  थे  क़दम  यूँ , के  फिसल  सकते  थे 

इस  क़दर  सर्द  न  होती  जो  अगर  दिल  की  फ़ज़ा 
आरज़ूओं  के  ये  अशजार भी  फल  सकते  थे 

ये  तो  अच्छा  ही  हुआ , बुझ  गई  एहसास  की  आग 
वर्ना  आँखों  में  सजे  ख़्वाब  भी  जल  सकते  थे 

हार  बैठे  थे  तुम्हीं  हौसला  इक  लग्ज़िश में 
हम  तो  'मुमताज़ ' फिसल  कर  भी  संभल  सकते  थे 

تشنگی  کو  تو  سرابوں  سے  بھی  چھل  سکتے  تھے 
اک  عنایت  سے  میرے  خواب  بہل  سکتے  تھے 

تم  نے  چاہا  ہی  نہیں  ورنہ  کبھی  تو  جاناں 
میرے  ٹوٹے  ہوئے  ارمان  بھی  نکل  سکتے  تھے 

تم  کو  جانا  تھا  کسی  اور  ہی  جانب , مانا 
دو  قدم  پھر  بھی  میرے  ساتھ  تو  چل  سکتے  تھے 

کاوشوں  میں  ہی  کہیں  کوئی  کمی  تھی , ورنہ 
یہ  ارادے  میری  قسمت  بھی  بدل  سکتے  تھے 

راس  آ  جاتا  اگر  ہم  کو  انا  کا  سودا 
خواب  آنکھوں  کے  حقیقت  میں  بھی  ڈھل  سکتے  تھے 

ہم  کو  اپنی  جو  انا  کا  نہ  سہارا  ملتا 
لڑکھراۓ   تھے  قدم  یوں , کے  پھسل  سکتے  تھے 

اس  قدر  سرد  نہ  ہوتی  جو  اگر  دل  کی  فضا 
آرزو ؤں  کے  یہ  اشجار  بھی  پھل  سکتے  تھے 

یہ  تو  اچھا  ہی  ہوا , بجھ  گئی  احساس  کی  آگ 
ورنہ  آنکھوں  میں  سجے  خواب  بھی  جل  سکتے  تھے 

ہار  بیٹھے  تھے  تمہیں  حوصلہ  اک  لغزش  میں 
ہم  تو  'ممتاز ' پھسل  کر  بھی  سمبھل  سکتے  تھے 



तश्नगी प्यास, सराबों  से मरीचिकाओं से,  काविश खोज, अना अहं, अशजार पेड़, लग्ज़िश लड़खड़ाहट 

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