है अधूरा आदमीयत का निज़ाम


है अधूरा आदमीयत का निज़ाम
हर बशर है आरज़ूओं का ग़ुलाम

आज फिर देखा है उस ने प्यार से
आज फिर दिल आ गया है ज़ेर-ए-दाम

तोडना होगा तअस्सुब का ग़ुरूर
है ज़रूरी इस नगर का इनहेदाम

हाय रे एहल-ए-ख़िरद की चूँ-ओ-चीं
वाह, ये दीवानगी का एहतेशाम

थक गए हो क्यूँ अभी से दोस्तो
बस, अभी तक तो चले हो चार गाम

देखते हैं, आगही क्या दे हमें
अब तलक तो आरज़ू है तशनाकाम

आदमी की बेकराँ तन्हाइयाँ
चार सू फैला हुआ ये अज़दहाम

ज़िन्दगी से जंग अब हम क्या करें
रह गई बस हाथ में ख़ाली नियाम

एक भी अपना नज़र आता नहीं
आ गया "मुमताज़" ये कैसा मक़ाम

निज़ाम – सिस्टम, बशर – इंसान, ज़ेर-ए-दामजाल में, तअस्सुबभेद-भाव, इनहेदामढा देना, एहल-ए-ख़िरद – अक़्ल वाले, चूँ-ओ-चीं - नुक्ता चीनी, एहतेशामशान ओ शौकत, गाम – क़दम, आगहीज्ञान, तशनाकामप्यासी, बेकराँअनंत, चार सूचारों तरफ़, अज़दहाम – भीड़, नियाम – मियान

Comments

Popular posts from this blog

ज़ालिम के दिल को भी शाद नहीं करते