समझता है मेरी हर इक नज़र, हर ज़ाविया मेरा


समझता है मेरी हर इक नज़र, हर ज़ाविया मेरा
न जाने कौन है वो अजनबी,   वो रहनुमा मेरा

सिमट  आता है हुस्न--दोजहाँ  मेरे सरापा में
जो बन जाती हैं उस की दो निगाहें आईना मेरा

मुकफ़्फ़ल कर दिया था हर निशाँ दिल में, मगर फिर भी
ज़माने पर अयाँ हो ही गया है अलमिया मेरा

रखा था दुखती रग पर हाथ अनजाने में यादों ने
ज़रा से लम्स ने फिर फोड़ डाला आबला मेरा

शिकायत मैं करूँ भी तो अब इस से फ़ायदा क्या है
हँसी में वो उड़ाता है, हमेशा, हर गिला मेरा

जूनून-ए-सरफ़रोशी  की सनाख्वानी भी होनी है
अभी तो ज़िन्दगानी पढ़ रही है मर्सिया मेरा

मिटाता है, मिटा कर फिर कई आकार देता है
मुक़द्दर रफ़्ता रफ़्ता ले रहा है जायज़ा मेरा

ज़रा ठहरो, समेटूँ तो, मैं अपने मुन्तशिर टुकड़े
हिला कर रख गया है ज़हन-ओ-दिल को सानेहा मेरा

ये जंग ए हस्त-ओ-बूदी है, यहाँ हर कोई तनहा है
मुझे सर करना है "मुमताज़" ये है मारका मेरा

ज़ाविया – पहलू, सरापा – सर से पाँव तक, मुकफ़्फ़ल – ताला बंद, अयाँ – ज़ाहिर, अलमिया – दुख भरा वाक़या, लम्स – स्पर्श, आबला – छाला, गिला – शिकायत, जूनून-ए-सरफ़रोशी - जान देने का जुनून, सनाख्वानी – स्तुति, मर्सिया – मुर्दे की तारीफ़ में गाया जाने वाला गीत, मुन्तशिर – बिखरा हुआ, सानेहा – सदमा पहुंचाने वाला वाक़या, हस्त-ओ-बूदी – अस्तित्व से संबंधित, मारका – युद्ध

samajhta hai meri har ik nazar, har zaaviya mera
"na jaane kaun hai wo ajnabi, wo rehnuma mera"

simat aata hai husn e dojahaaN mere saraapa meN
jo ban jaati haiN us ki do nigaaheN aaina mera

mukaffal kar diya tha har nishaN dil meN, magar phir bhi
zamaane par ayaaN ho hi gaya hai almiya mera

rakha tha dukhti rag par haath anjaane meN yaadoN ne
zara se lams ne phir phod daala aabla mera

shikaayat maiN karuN bhi to ab is se faayda kya hai
hansi meN wo udaata hai, hamesha, har gila mera

junoon e sarfaroshi ki sanaakhwaani bhi honi hai
abhi to zindagaani padh rahi hai marsiya mera

mitaata hai, mita kar phir kai aakaar deta hai
muqaddar rafta rafta le raha hai jaayzaa mera

zara thehro, sametuN to, maiN apne muntashir tukde
hilaa kar rakh gaya hai zehn o dil ko saaneha mera

ye jang e hast o boodi hai, yahaN har koi tanhaa hai
mujhe sar karna hai "mumtaz" ye hai maarka mera

Comments

Popular posts from this blog

चलन ज़माने के ऐ यार इख़्तियार न कर

किरदार-ए-फ़न, उलूम के पैकर भी आयेंगे

हमारे बीच पहले एक याराना भी होता था